Saturday, 12 August 2017

2-540 बूढ़े बकरे

बूढ़े बकरे जैसी शकल, 
फ्रांसीसियों  की नकल, 
ज़ुबाँ पर गिरा फालिज,
भैंस से बदतर अकल, 
नाशुकरा फैलाए घ्रणा, 
अमन-चैन में दे दखल,
जाने दो यारों उसे तुम,
सठियाया है दरअसल..(वीरेंद्र)/2-540


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी

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