Sunday, 6 August 2017

1-948 ज़ख्मों को अपने जब

ज़ख्मों को अपने जब कभी हवा दी,
हर बार ही एक नई ग़ज़ल उभर आई..(वीरेंद्र)/1-948


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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