Wednesday, 5 July 2017

1-944 यह माना, समेट दोगे

यह माना, समेट दोगे मुझे दो गज़ ज़मींन में,
पर मेरा आसमाँ तो तुम कम कर नहीं सकते..(वीरेंद्र)/1-944


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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