Wednesday, 5 July 2017

1-942 रफू से ऐब-ऐ-पैरहन

रफू से ऐब-ऐ-पैरहन दुनियां की निगाहों से छुप जाते हैं,
रिश्ते मगर रफू होते नहीं, हो भी जाएं तो बड़े सताते हैं,.(वीरेंद्र)/1-942

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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