Thursday, 27 July 2017

0-606 सारे ज़ख्म पुराने

सारे ज़ख्म पुराने बेअसर होते जा रहे हैं,
दोबारे से सब्ज़, ये शजर होते जा रहे हैं,
काट भी दोगे शाखों को अगर तुम लोगों,
ये न समझना परिंदे बेघर होते जा रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-506


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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