Wednesday, 5 July 2017

0-605 एहसास-ऐ-दर्द हो अगर

एहसास-ऐ-दर्द हो अगर इस दुनियां को,
तो आंसुओं के बहने की ज़रुरत क्या है.
जिनकीं आँखें ही हों एक खुली किताब,
उन्हें किताब लिखने की ज़रुरत क्या है..(वीरेंद्र)/०-605

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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