Wednesday, 19 July 2017

2-530 इस सरकार के अंध-विरोधी

इस सरकार के अंध-विरोधी,
जलन में हो रहे देश-विरोधी,
पूरे विश्व मे छाए मोदी-मोदी,
देश मे चिल्लाते चंद विरोधी..(वीरेंद्र)/2-530


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-526 देर न लगेगी कश्मीर को

देर न लगेगी कश्मीर में सब कुछ मिट जाने में,
देश अगर तुमने ज़िद की मसला ये लटकाने में..(वीरेंद्र)/2-526


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-947 तुम आकर कानों में

तुम आकर कानों में ऐसा क्या कह गए,
आंखें खुल गईं, अरमानों के आंसू बह गए..(वीरेंद्र)/1-947


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-946 हर बार ही दे देते हैं

हर बार ही दे देते हैं एक नया दर्द,
कह देते हैं दर्द ही तो है दवा-ऐ-दर्द..(वीरेंद्र)/1-946


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 5 July 2017

1-945 बेवफा हो जाएं वो, और

बेवफा हो जाएं वो, और इल्जाम-ऐ-बेवफाई मै भुगतूं,
ये कैसा इन्साफ, गुनाह करें वो, अंजाम मै भुगतूं..(वीरेंद्र)/1-945

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-944 यह माना, समेट दोगे

यह माना, समेट दोगे मुझे दो गज़ ज़मींन में,
पर मेरा आसमाँ तो तुम कम कर नहीं सकते..(वीरेंद्र)/1-944


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-525 मेरे मुल्क के गिद्ध भी

मेरे मुल्क के गिद्ध भी हर किसी को नहीं निगलते हैं,
वो भी जानते हैं इस धरती पर कुछ गद्दार भी पलते हैं..(वीरेंद्र)/2-525


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-943 ख्वाहिश,हसरत,आस,

ख्वाहिश, हसरत, आस, उम्मीद, आरज़ू और तमन्ना,
हर रोज़ लिख रहे हैं ये, ज़िन्दगी का एक और पन्ना..(वीरेंद्र)/1-943


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-524 हिकारत से न देख

हिक़ारत से न देख दहलीज़ के सवाली को,
न जाने कब किसका किरदार बदल जाये..(वीरेंद्र)/2-524


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-942 रफू से ऐब-ऐ-पैरहन

रफू से ऐब-ऐ-पैरहन दुनियां की निगाहों से छुप जाते हैं,
रिश्ते मगर रफू होते नहीं, हो भी जाएं तो बड़े सताते हैं,.(वीरेंद्र)/1-942

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-605 एहसास-ऐ-दर्द हो अगर

एहसास-ऐ-दर्द हो अगर इस दुनियां को,
तो आंसुओं के बहने की ज़रुरत क्या है.
जिनकीं आँखें ही हों एक खुली किताब,
उन्हें किताब लिखने की ज़रुरत क्या है..(वीरेंद्र)/०-605

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-941 मै बिखरा हुआ मोती नहीं,

मै बिखरा हुआ मोती नहीं जो तुम उठा लो बिखर जाने के बाद,
टूटा हुआ दिल हूँ, कोई कीमत नहीं जिसकी, टूट जाने के बाद..(वीरेंद्र)/1-941

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"