Saturday, 17 June 2017

1-936 वो शेर ही क्या जिसमे

वो शेर ही क्या जिसमे जज़्बात की ऊंचाई न हो,
वो ख्याल ही क्या जिसमे दम और गहराई न हो..(वीरेंद्र)/1-936

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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