Saturday, 17 June 2017

0-603 पूरी किताब को मेरी

पूरी किताब को मेरी पढ़ लिया उसने,
उसके एक पन्ने को मोड़ दिया उसने,
ज़बरदस्त  पैनी नज़र थी ज़ालिम की,

मेरी दुखती रग को ताड़ लिया उसने..(वीरेंद्र)/०-603

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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