Tuesday, 27 June 2017

2-529 सियासतदानों, सियासती दांवपेंच

सियासतदानों, सियासती दांवपेंच क्यों चलाए रखते हो,
शांत शहर को और पुलिस थानों को जलाए रखते हो,
समझौता कोई होने नहीं देते सरकार और किसानों में,
शहरों से भीड़ लाकर गाँवों में, मौहाल गरमाए रखते हो..(वीरेंद्र)/2-529

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-940 वो लम्हा जो तेरे साथ

वो लम्हा जो तेरे साथ गुज़रा ही नहीं,
क्यों मैं उसका तस्सव्वुर किये बैठा हूँ..(वीरेंद्र)/1-940


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-939 आँखों से जो

आंखों से जो शराब पिलाते हैं,
वो ही मुझको शराबी बताते हैं..(वीरेंद्र)/1-939


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 17 June 2017

0-603 पूरी किताब को मेरी

पूरी किताब को मेरी पढ़ लिया उसने,
उसके एक पन्ने को मोड़ दिया उसने,
ज़बरदस्त  पैनी नज़र थी ज़ालिम की,

मेरी दुखती रग को ताड़ लिया उसने..(वीरेंद्र)/०-603

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-523 मुझसे लिखवा लिया वो,

मुझसे लिखवा लिया वो, जो मैं लिखना नहीं चाह रहा था,
लोगों ने अर्थ निकाल लिया वो, जो मैं कहना नहीं चाह रहा था..(वीरेंद्र)/2-523


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"-

1-938 जैसे चाहा उसने

जैसे चाहा उसने, वैसे मैंने ये ज़िन्दगी बिता दी,
सुकूँ न मिला, गो मैने उसकी कीमत भी चुका दी..(वीरेंद्र)/1-938


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-528 भावनाएं किसी काम की

भावनाएं किसी काम की नहीं, ये कभी समझी नहीं जा सकतीं.,
शब्द-भण्डार कम पड़ जाते हैं, कभी व्यक्त की नहीं जा सकतीं,
दिल से निकाल कर फेंक देना ही अच्छा है इनका इस ज़माने में,
ऐसा भी नहीं है कि जिंदगियां इनके बिना जी नहीं जा सकतीं ..(वीरेंद्र)/2-528

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-522 भारतमाता हम तुझसे

भारत माता हम तुझसे शर्मिंदा हैं,
तेरे दोषी इतनी शान से जिंदा हैं..(वीरेंद्र)/2-522

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-937 कुछ लोग सामान-ऐ-

कुछ लोग सामान-ऐ-दिलबस्तगी होते हैं,
नहीं रहते जब काम के, तो अजनबी होते हैं..(वीरेंद्र)/1-937

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-936 वो शेर ही क्या जिसमे

वो शेर ही क्या जिसमे जज़्बात की ऊंचाई न हो,
वो ख्याल ही क्या जिसमे दम और गहराई न हो..(वीरेंद्र)/1-936

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 11 June 2017

1-935 तेरा उसे भूल जाना

उसको भूल जाना तेरे लिए नामुमकिन था ऐ "अजनबी",
शुक्र मना वो खुद ही बदल गया और ये मुमकिन हो गया..(वीरेंद्र)/1-935

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-934 बड़ा कहती थी मुझसे

बड़ा कहती थी मुझसे, "मुझे भूल जा", "मुझे भूल जा",
ले मेने तुझे भुला दिया, अब तु भी ज़रा मुझे भूल के दिखा..(वीरेंद्र)/1-934

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"