Saturday, 13 May 2017

1-927 वो थक-हार गए दूर

वो थक-हार गए दूर मंज़िल से होते गए,
जो लोग जब जी चाहा, रास्ते बदलते गए..(वीरेंद्र)/1-927


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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