Thursday, 18 May 2017

1-931 मै भी वही, तुमभी वही

मै भी वही, तुम भी वही, दुनियां में सभी कुछ वही,
फिरभी करीने से बदल डाला प्यार का मंज़र तुमने..(वीरेंद्र)/1-931


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-511 तेरे आने की खबर

तेरे आने की खबर जबसे आई है,
उदास ज़िन्दगी ने ली अंगड़ाई है,
बदली बदली सी है हर कोई शय,
कुदरत भी अजब रंग में नहाई है..(वीरेंद्र)/2-511


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 17 May 2017

1-929 वो प्यार, प्यार ही क्या

वो प्यार, प्यार ही क्या, जिसमे आँखें नम न हों,
वो भला निखरेगा क्या, अगर उसमे ग़म न हों..(वीरेंद्र)/1-929

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 15 May 2017

1-928 वक्त-ऐ-दौरां में एहसास

वक्त-ऐ-दौरां में एहसास-ओ-जज़्बात दिलों से ऐसे निकल गए,
पता नहीं चलता जिंदगी में कौन आए, कब और कैसे निकल गए..(वीरेंद्र)/1-928

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






1-930 दुनियां-जहाँ को ज़ख्म न दिखा,

दुनियां-जहाँ को ज़ख्म न दिखा, सबके पास "मरहम" नहीं होता,
नमक छिड़क देते हैं लोग उनपर, उनको कोई भी गम नहीं होता..(वीरेंद्र)/1-930

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

0-602 परिंदे गए, घोंसला

परिंदे गए, घोंसला खाली है,
होरही उदास डाली-डाली है,
पत्ता-पत्ता थरथराने लगा है,
शायद, खिज़ा आने वाली है..(वीरेंद्र)/0-602


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 13 May 2017

1-927 वो थक-हार गए दूर

वो थक-हार गए दूर मंज़िल से होते गए,
जो लोग जब जी चाहा, रास्ते बदलते गए..(वीरेंद्र)/1-927


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-926 पता नहीं मकतल पर

पता नहीं मक़तल पर हूँ कि मैखाने पर हूँ
अब जहां भी हूँ, बस मैं तेरे निशाने पर हूँ..(वीरेंद्र)/1-926


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-925 या तो देदे मुझे जिंदगी

या तो देदे मुझे ज़िन्दगी दुबारा से मेरे मालिक,
या फिर मेरे तजुर्बों में अब कोई इजाफा न कर..(वीरेंद्र)/1-925

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 9 May 2017

2-520 बिगाड़ सका है क्या,

बिगाड़ सका है क्या, भला कोई कानून उसका,
कालेधन से बन चुका हो कुबेर, कुनबा जिसका..(वीरेंद्र)/2-520

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 7 May 2017

1-924 मै नहीं कहता मुझसे

मैं नहीं कहता मुझसे कोई राब्ता रख,
परअपनी खैरियत से तो महरूम न कर..(वीरेंद्र)/1-924


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-922 तु पत्थर थी, मै भी

तू पत्थर थी, मै भी पत्थर हो गया हूँ,
तू एक प्रश्न थी, मै तेरा उत्तर हो गया हूँ. (वीरेंद्र)/1-922

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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Wednesday, 3 May 2017

2-519 हर इंसान खुद ही

हर इंसान खुद ही खोया हुआ है कहीं,
और पूछता है ये इंसान कहाँ खो गए..(वीरेंद्र)/2-519

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-923 तेरे आने से भी कम

तेरे आने से भी कम न होंगे मेरे ग़म,
एक तन्हाई ही तो बस मेरा ग़म नहीं..(वीरेंद्र)/1-923


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 1 May 2017

0-598 झूंटे लोग जिनको

झूंटे लोग जिनको पसंद नहीं आते हैं,
दुनियां में ऐसे लोग तनहा रह जाते हैं,
बड़े नाज़ुक मिजाज़ होते हैं वो बेचारे,
लफ़्ज़ों से नहीं, लहजों से मर जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-598

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"