Saturday, 22 April 2017

1-920 तुम्हारे बगैर बस यह

तुम्हारे बगैर बस यह ज़िन्दगी सरक रही है,
बुझने से पहले लौ चराग की भड़क रही है..(वीरेंद्र)/1-920

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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