Wednesday, 5 April 2017

0-594 और भी बड़े इम्तिहान

और भी बड़े इम्तिहान होने हैं इश्क के,
दर्द सहने की कूबत को हमें आज़माना है
हमही ने मोड़ा है रुख कश्ती का उधर,
जिधर से तूफान को समुंदर में आना है..(वीरेंद्र)/0-594

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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