Wednesday, 1 March 2017

1-893 किस गुज़रे वाकये

किस गुज़रे वाकिये की याद दिला दी थी मैंने,
जो मेरे खत को लौटा दिया किर्चे-किर्चे करके..(वीरेंद्र)/1-893


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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