Friday, 31 March 2017

1-907 बहु और बेटे को

बहु और बेटे को बूढ़े बाप का इतना ख्याल रहता है,
बेटा अपने बाप को एक बिल्डिंग छोड़कर रखता है..(वीरेंद्र)/1-907


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-906 बुढापे का माकूल एहसास

बुढ़ापे का माकूल एहसास नहीं होता खुदके बूढ़े होने तक,
जवान औलाद से कोई तवक्को न रख उनके बूढ़े होने तक..(वीरेंद्र)/1-906


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-905 मै वाकिफ हूँ मयकशी

मैं वाकिफ़ हूँ मयकशी के ख़ौफ़नाक नतीजों से,
इसीलिए मुझे खुद से ज़्यादा मआशरे की फ़िक्र है..(वीरेंद्र)/1-905


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 29 March 2017

2-513 मानते हैं सब ही

मानते हैं सब ही, मन स्थिर नहीं चंचल होता है,
तो कोई बताए हमें 'मनचला' बुरा कैसे होता है..(वीरेंद्र)/2-513


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-508 यू.पी. में ये कैसी घिनौनी

यू.पी. में ये कैसी घिनौनी राजनीती की जा रही है,
मजनू राँझा महिवाल की अनदेखी की जा रही है,
मनचलों के खिलाफ "एंटी रोम्यो स्क्वाड" बनाकर,  

सिर्फ रोमियो को क्यूँ इतनी तरजीह दी जारही है..(वीरेंद्र)/2-508

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-904 मुझसे मुहब्बत नहीं

मुझसे मुहब्बत नहीं, तो जुदा होके रोया क्यों था,
सींचना नहीं था, तो इस पौधे को बोया क्यों था..(वीरेंद्र)/1-904


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 28 March 2017

1-903 नादाँ था सवाल करता

नादाँ था सवाल करता गया, ख़ामोशी को समझ ना सका,
साथ साथ चला, फिर भी मेरी धड़कनों को सुन ना सका.(वीरेंद्र)/1-903


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-502 'विवाद' की जड़ में बस

'विवाद' की जड़ में बस ज़िद तेरी है और मेरी है,
वरना तो मुद्दे में कोई रूचि, ना तेरी है न मेरी है..(वीरेंद्र)/2-502


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-507 नेकी, इंसानियत की राह

नेकी, इंसानियत की राह में रोड़े आते हैं,
कई मासूमों के नेक दिल तोड़े जाते हैं,
भाई चारा दुनियां से ना उठा है न उठेगा,
कुछ लोग बस यूँ ही मूछें मरोड़े जाते हैं..(वीरेंद्र)/2-507


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-902 ज़िन्दगी तेरे लिय ही

ज़िन्दगी तेरे लिए ही सपने मैं सजाए रखता हूँ,
तू है उधार की फिरभी सीने से लगाए रखता हूँ..(वीरेंद्र)/1-902


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-501 इधर न निगाह डालो

इधर न निगाह न डालो ख़िज़ाओं मेरा मुल्क रंगबिरंगा बगीचा है,
यूँही नहीं फूल खिले हैं इसमें, शहीदों ने अपने खूँ से इसे सींचा है..(वीरेंद्र)/2-501


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-901 हम ही कर देते हैं

हम ही कर देते हैं क़त्ल रिश्तों का,
वरना तो मौत से भी वो मरा नहीं करते..(वीरेंद्र)/1-901


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-900 ना ख़ुशी कुछ है,

ना खुशी कुछ है, ना ग़म कुछ है,
वक्त का मिज़ाज़ ही सब कुछ है..(वीरेंद्र)/1-900


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-899 चुपके से सिर्फ देखते

चुपके से सिर्फ देखते हो कभी मिला भी करो,
आँखों में सिर्फ झांकते हो कभी बसा भी करो..(वीरेंद्र)/1-899

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 27 March 2017

0-593 तुझे अगर मुझसे मुहब्बत

तुझे अगर मुझसे मुहब्बत नहीं,
तो बता जुदा होकर रोया क्यों था,
सींचना नहीं था इस पौधे को,
तो भला तुमने उसे बोया क्यों था..(वीरेंद्र)/0-593


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 21 March 2017

1-898 मेरे बुरे वक्त

मेरे बुरे वक्त मेरा बुरा न मान, तुझे बुरा कहने पर,
याद रख, मै ही याद करूंगा तुझे, तेरे ना रहने पर..(वीरेंद्र)/1-898

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-897 ये आवाज़ यकीनन

ये आवाज़ यकीनन उसके दिल की नहीं,
पत्थर भी कहीं इस तरह धड़का करते हैं..(वीरेंद्र)/1-897


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-592 आपको ज़रा बेवफा

आपको ज़रा बेवफा क्या कह दिया,
आपने तो हाथ में हमें आईना दे दिया।
देखता हूँ बस तुम्हारी ही सूरत इसमें,
तुमने कौनसा मुझे ये आइना दे दिया।..(वीरेंद्र)/0-592


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-896 शानों पर बिखरी

शानों पर बिखरी आपकी ये ज़ुल्फ़ें गुलबर्ग लगती हैं,
नाज़ां हूँ दीद पर, आप सर से पांव गुलमर्ग लगती हैं..(वीरेंद्र)/1-896


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-506 पिछड़ेपन के खिलाफ

पिछड़ेपन के खिलाफ आए दिन हम पुरज़ोर आवाज़ें उठाते हैं,
और हम ही हैं जो रोज़-रोज़ विकास की राह में रोड़े अटकाते हैं।
कारवां-ऐ-तरक्की थमता नहीं किसी भी सूरत में, ये समझ लो,
हम लोग जब थक जाते हैं, तो दूसरे लोग कदम आगे बढ़ाते हैं।..(वीरेंद्र)/2-506

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 16 March 2017

1-895 न्यामते-खुदा की शक्ल में


न्यामते-खुदा की शक्ल में मेरे पास मेरे दर्द तो हैं,
गर मेरे दामन  में नहीं खुशियाँ, मेरे इर्द-गिर्द तो हैं,.(वीरेंद्र)/1-895

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 8 March 2017

1-894 हवा के झोंके मेरे चराग

हवा के झोंके मेरे चराग़ को ज़्यादा देर जलने नहीं देंगे,
तू भी चली जा ख़ुशी, मेरे गम तुझे और यहाँ रहने नहीं देंगे..(वीरेंद्र)/1-894


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 1 March 2017

2-505 देश की ख़ातिर फूटी कौड़ी

देश की ख़ातिर फूटी कौड़ी भी न देते जो, 
उनको देश से हर वक्त बस खैरात चाहिए, 
काला धन देश के खजाने में आए न आए,
पहले उन्हें फोकट का 15-15 लाख चाहिए..(वीरेंद्र)/2-505


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-893 किस गुज़रे वाकये

किस गुज़रे वाकिये की याद दिला दी थी मैंने,
जो मेरे खत को लौटा दिया किर्चे-किर्चे करके..(वीरेंद्र)/1-893


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-892 कर दिया दाखिल उसने

कर दिया दाखिल उसने, वृद्धाश्रम में उन्हें ले जा कर,
बेशुमार शेर जिसने लिख दिए थे खिदमते-माँ-बाप पर..(वीरेंद्र)/1-892


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-891 मांग ली मन्नत खोटा

मांग ली मन्नत खोटा सिक्का भगवान् को चढ़ा कर,
फेंकना था जो सड़ा फल, अर्पित कर दिया मंदिर जाकर..(वीरेंद्र)/1-891


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-890 गम नहीं जो तुमने मुझे

ग़म नहीं जो तुमने मुझे दो चार ग़म भी दे दिए,
आखिर इतनी खुशियां भी मेरे किस काम की थीं..(वीरेंद्र)/1-890


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"