Saturday, 18 February 2017

3-95 Edit...बचपन तो गया मेरा,

DRAFT
बचपन तो गया, मेरे खिलोने यहाँ अब भी रक्खे हैं,
मुस्कराहट गई, होठों पे उसके निशाँ अब भी रक्खे हैं,

सहर से पहले, अंधेरों में जो चराग जलाये थे मैंने,
अंधेरों की याद में बुझे चराग यहाँ अब भी रक्खे हैं, 

मुझे इतना ज़ब्त बख्शने वाले खुदा, ये भी बता दे,
ज़हर में बुझे कितने तीर, ज़माने ने यहाँ अब भी रक्खे हैं,

add 2 more here

No comments:

Post a Comment