Tuesday, 21 February 2017

1-885 काश आंसुओं का भी

काश, आंसुओं का भी कोई रंग हुआ करता,
इनको लोग पानी तो न समझ लिया करते..(वीरेंद्र)/1-885

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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