Friday, 24 February 2017

1-887 काश आंसुओं का

काश आंसुओं का भी कोई रंग हुआ करता,
लोग इनको पानी तो न समझ लिया करते..(वीरेंद्र)/1-887


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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