Sunday, 19 February 2017

1-884 कभी जिनके लिए दरियाए-

कभी जिनके लिए दरियाऐ-अश्क़ बहाए थे हमने,
वो आज क़तराए-मुहब्बत को हमें तरसाए बैठे हैं..(वीरेंद्र)/1-884


© रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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