Saturday, 18 February 2017

1-881 मर जाते हैं जो,

मर जाते हैं जो, उनका जनाज़ा एक बार निकलता है,
अंदर से टूटके मरते हैं जो, उनका कई बार निकलता है..(वीरेंद्र)/1-881

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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