Wednesday, 1 February 2017

0-588 कुछ देर और होने देते

कुछ देर और होने देते दीदारे-हुस्न हमें,
नशा चढ़ गया बस लडखड़ाना रह गया.

नींदें उड़ गईं, ख्वाब देखने बंद हो गये,
बस अब हसरतों को दफनाना रह गया..(वीरेंद्र)/0-588

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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