Saturday, 18 February 2017

0-591 शाखें टूट गईं मेरी,

शाखें टूट गईं मेरी, लोग समझते हैं अब ये शजर टूट गया है,
कोई पानी नहीं देता मुझको, सोचते हैं, ये अब सूख गया है,
मगर मेरी जड़ें अब भी बहुत गहरी और मज़बूत हैं, लोगों,
बस मेरी ज़मीन छिनने वाली है, मेरा भाग्य अब रूठ गया है..(वीरेंद्र)/0-591

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी

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