Saturday, 25 February 2017

2-500 बोलने की और भोंकने की

बोलने की और भोंकने की आज़ादी में बड़ा फर्क होता है,
जो न समझा इसको, एक दिन उसका बेड़ा गर्क होता है..(वीरेंद्र)/2-500


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 24 February 2017

2-504 सहिष्णुता छोड़, असहिष्णु

सहिष्णुता छोड़, असहिष्णु बन जाना चाहता हूँ,
देश के गद्दारों को सबक मै सिखाना चाहता हूँ,
मेरे देश की शान के खिलाफ बोलने वालों की, 
आग उगलती जुबां अब मै खींच लेना चाहता हूँ..(वीरेंद्र)/2-504

1-889 घोंप दिए भाले ओरों के

घोंप दिए भाले औरों के सीनों में जिन्होंने,
उन्हें एक तिनका भी लगने से दर्द होता है..(वीरेंद्र)/1-889

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-888 मत दे इतने दोस्त,

मत दे इतने दोस्त ऐ खुदा, मुझे फिरसे गरीब कर दे,
नहीं हो सकता गर कोई दोस्त तो मुझे रकीब कर दे..(वीरेंद्र)/1-888


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-503 गधे को गोद में

गधे को गोद में बिठा लो, तो गधे का क्या कसूर,
कौव्वे को मोती खिलाओ तो कौव्वे का क्या कसूर, 
मूर्खों को खुद ही शौक हो अगर गर्त में डूबने का, 
तो बोलिए, फिर इसमें डुबाने वाले का क्या कसूर .(वीरेंद्र)/2-503

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी".

2-494 कोई नहीं रहा असल में

कोई नहीं रहा असल में मेरे वोट के काबिल,
जिसको दिया वो भी हो गया धूर्तों में शामिल,
मुल्क सरक रहा है बस यूँ ही चींटी की तरह,
हरेक मशगूल लूटने में, जनता हुई है ग़ाफिल..(वीरेंद्र)/2-494


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-887 काश आंसुओं का

काश आंसुओं का भी कोई रंग हुआ करता,
लोग इनको पानी तो न समझ लिया करते..(वीरेंद्र)/1-887


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-886 मै नहीं डरता, वो ही

मैं नहीं डरता,वो ही मुझसे डर जाती है,
मौत मेरे अगल बग़ल से गुज़र जाती है..(वीरेंद्र)/1-886


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 21 February 2017

1-885 काश आंसुओं का भी

काश, आंसुओं का भी कोई रंग हुआ करता,
इनको लोग पानी तो न समझ लिया करते..(वीरेंद्र)/1-885

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 19 February 2017

1-884 कभी जिनके लिए दरियाए-

कभी जिनके लिए दरियाऐ-अश्क़ बहाए थे हमने,
वो आज क़तराए-मुहब्बत को हमें तरसाए बैठे हैं..(वीरेंद्र)/1-884


© रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 18 February 2017

1-883 गले से लगा लो पेड़ों को

गले से लगा लो पेड़ों को तुम, वे पाला नहीं बदलते,
वो कट जाते हैं, उखड जाते हैं, रवैय्या नहीं बदलते..(वीरेंद्र)/1-883

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-882 आधी दुनियां पर बेवफाई का

आधी दुनियां पर बेवफाई का इल्जाम है,
मेरा यार तो बेचारा बस यूँ ही बदनाम है..(वीरेंद्र)/1-882


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-881 मर जाते हैं जो,

मर जाते हैं जो, उनका जनाज़ा एक बार निकलता है,
अंदर से टूटके मरते हैं जो, उनका कई बार निकलता है..(वीरेंद्र)/1-881

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-591 शाखें टूट गईं मेरी,

शाखें टूट गईं मेरी, लोग समझते हैं अब ये शजर टूट गया है,
कोई पानी नहीं देता मुझको, सोचते हैं, ये अब सूख गया है,
मगर मेरी जड़ें अब भी बहुत गहरी और मज़बूत हैं, लोगों,
बस मेरी ज़मीन छिनने वाली है, मेरा भाग्य अब रूठ गया है..(वीरेंद्र)/0-591

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी

2-499 नेता का काम बोले या न बोले

नेता का काम बोले या न बोले, उसका उपनाम बोलता है,
प्रधानमंत्री तो भाइयों बनेगा वही, जिसका DNA बोलता है..(वीरेंद्र)/2-499

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-95 Edit...बचपन तो गया मेरा,

DRAFT
बचपन तो गया, मेरे खिलोने यहाँ अब भी रक्खे हैं,
मुस्कराहट गई, होठों पे उसके निशाँ अब भी रक्खे हैं,

सहर से पहले, अंधेरों में जो चराग जलाये थे मैंने,
अंधेरों की याद में बुझे चराग यहाँ अब भी रक्खे हैं, 

मुझे इतना ज़ब्त बख्शने वाले खुदा, ये भी बता दे,
ज़हर में बुझे कितने तीर, ज़माने ने यहाँ अब भी रक्खे हैं,

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1-880 तेरी खुशबू तेरा मुकम्मल

तेरी खुशबू तेरा मुकम्मल पता देती है मुझे,
तेरी आमो-दरफ्त की इत्तिला देती है मुझे..(वीरेंद्र)/1-880


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-879 चलो ये वादा है तुमसे,

चलो ये वादा है तुमसे, तुम्हे ज़रूर भुला देंगे हम, 
मगर ये नहीं जानते, आखरी सांस कब लेंगे हम..(वीरेंद्र)/1-879


रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

2-493 कोई कह रहा, बच्चे हैं

कोई कह रहा, बच्चे हैं, बेचारे बलात्कार कर देते हैं,
कश्मीरी कहते, बच्चे हैं, सेना पर पत्थर फ़ेंक देते हैं,
पर देखिये मेरा भारत कितना है सहिष्णु और महान,
चुनावों के वक्त इन्ही लोगों को नेता हम चुन लेते हैं..(वीरेंद्र)/2-493

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-498 न रोक सको फौजों पर

न रोक सको फौजों पर पत्थरबाज़ी, तो अपनी अक्ल पर तो न होने दो,
भूलकर सियासी दांवपेंच, दुश्मन-परस्तों को हावी मुल्क पर तो न होने दो..(वीरेंद्र)/2-498


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-497 सियासतदानों ने हर सिम्त

सियासतदानों ने हर सिम्त मसले बड़े उलझा रक्खे हैं,
ज़ुबाँ से निकले अलफ़ाज़ नफरतों के ज़हर में बुझा रक्खे हैं..(वीरेंद्र)/2-497


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 11 February 2017

2-492 वंशराज की परंपरा रुक

वंशराज की परंपरा रुक जाएगी,
देश की तरक्की ना होने पाएगी,
युवराज जी को समझाओ लोगों,
जनता भावी-युवराज कब पाएगी..(वीरेंद्र)/2-492


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-878 तमाम उम्र बिन जिए ही

तमाम उम्र बिन जिए ही ज़िन्दगी गुज़ार दी हमने,
तुम्हे पाने के बाद अब जीने की आदत हो रही है..(वीरेंद्र)/1-878


वीरेंद्र सींह "अजनबी"

2-496 न बच सके छींटों से

ना बच सके छींटों से, रेनकोट पहनकर भी हम नहाए,
कितने भी मासूम बने, लोगों को चोर ही नज़र हम आए..(वीरेंद्र)/2-496


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-495 अंग्रेजों के पिट्ठू

अंग्रेजों के पिट्ठू क्यूं इतने तिलमिलाए हैं,
जबसे उनके आका रेनकोट पहनके नहाए हैं..(वीरेंद्र)/2-495


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 9 February 2017

1-877 मै मान गया था तु मुझे

मैं मान गया था तू चाहे तो मुझे भूल जाए,
पर यूं न चाहा था, इतनी दूर निकल जाए..(वीरेंद्र)/1-877

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 6 February 2017

1-876 घायल कर दिया बस आपकी

घायल कर दिया बस आपकी इक सीधी सी नज़र ने,
जाने क्या होता अपना, गर ज़रा सी तिरछी वो हो जाती ..(वीरेंद्र)/1-876

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-875 मेरी देखा देखि वो भी चले

मेरी देखा देखी वो भी चले थे शायरी करने,
पत्थर दिल से मगर उनके कोई सदा न आई..(वीरेंद्र)/1-875


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-874 आँखों ने तो कोई कमी

आँखों ने तो कोई कमी न रखी सब कहने में,
तुम अलफ़ाज़ पर यूँ ही काबू करते चले गए..(वीरेंद्र)/1-874


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-873 मुद्दत हो गई जाने कहाँ

मुद्दत हो गई जाने कहीं खो गया वो ज़माना,
अब भी दिल नहीं मानता, बदल गया वो ज़माना..(वीरेंद्र)/1-873


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-489 बापू ने अपने देश से

बापू ने अपने देश से कौन सा मान-सम्मान ले लिया,
किसी ने उनका नाम, किसी ने उनका सामान ले लिया..(वीरेंद्र)/2-489


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-488 "वंश-गुलामी" का नशा

"वंश-गुलामी" का नशा जिनको सर से पाँव चढ़ा है,
इतिहास में उन्होंने ता-उम्र बस एक ही नाम पढ़ा है..(वीरेंद्र)/2-488


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-872 मेरे जुनूं को देख

मेरे जुनूँ को देख, अंदाज़े बयाँ को न देख,
इश्क़ बेपढ़ा होता है उसकी ज़ुबाँ को न देख..(वीरेंद्र)/1-872


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 4 February 2017

0-590 आपके मेरे दरम्यान कभी

आपके मेरे दरम्यान कभी कोई फासला न था,
मिले जब भी, साथ में शख्स कोई दूसरा न था,
फ़ासले हो गए, हमसफ़र भी मिल गए आपको,
इतनी जल्दी यह होगा, ग़ुमाँ कोई इसका न था..(वीरेंद्र)/0-590


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 1 February 2017

1-871 नज़दीक आओ कि

नज़दीक आओ कि जज़्बात का उफ़ान आ जाए,
इस क़दर भी नहीं, कि साँसों में तूफ़ान आ जाए..(वीरेंद्र)/1-871


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-589 कभी ख़ुशी में भी आँख

कभी ख़ुशी में भी आँख से आंसू आ जाते हैं,
कभीकभी किसी दर्द में भी हम मुस्कुराते हैं.
मुस्कराहट भी, आंसू भी हमी में हैं पोशीदा,
पर इन्हें अक्सर कुछ लोग भी हमें दे जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-589


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-588 कुछ देर और होने देते

कुछ देर और होने देते दीदारे-हुस्न हमें,
नशा चढ़ गया बस लडखड़ाना रह गया.

नींदें उड़ गईं, ख्वाब देखने बंद हो गये,
बस अब हसरतों को दफनाना रह गया..(वीरेंद्र)/0-588

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"