Thursday, 5 January 2017

०-583 अब तो सचमुच फिकर

अब तो सचमुच फ़िकर सी होने लगी है,
बात जो कही थी उसने, पूरी होने लगी है।
ज़िंदगी मुकम्मल सी हो गयी थी जो कभी,
फिर से मगर अब अधूरी सी होने लगी है..(वीरेंद्र)/०-583


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

No comments:

Post a Comment