Sunday, 15 January 2017

2-486 मै जो जीवन-पर्यंत

मै जो जीवन-पर्यंत व्यथित हो मोह-पाक्ष में जकड़ा रहा,
अंतिम दौर में आकर अपनों ने मोह-मुक्त कर ही दिया..(वीरेंद्र)/2-486


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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