Monday, 9 January 2017

1-865 ज़ख्म भर जाते हैं

ज़ख्म भर जाते हैं, मगर निशाँ छोड़ जाते हैं,
जो नहीं भरते, बनके नासूर साथ चले जाते हैं..(वीरेंद्र)/1-865


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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