Saturday, 28 January 2017

2-487 मै धर्मविहीन हो जाऊंगा,

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मैं धर्मविहीन हो जाऊंगा, गर तुम भी अपना धर्म छोड़ दो।
वर्ना तो आज से मुझको 'सांप्रदायिक' कहना तुम छोड़ दो।.(वीरेंद्र)/2-487


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-587 क्यों संजो रखी हैं

क्यों संजो रखी हैं आपने इतनी मुहब्बतें,
कहाँ लेके आप जाओगे इतनी मोहब्बतें,
कद्रदान हमसा हरगिज़ न मिलेगा कोई,
किसपे आप लुटाओएगे इतनी मोहब्बतें..(वीरेंद्र)/0-587


रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 24 January 2017

2-491 कोई खुली जुबांन से,

कोई खुली जुबान से, कोई दबी ज़ुबान से,
कोई देशद्रोही हिंद से, कोई पाकिस्तान से,
कर रहा दहशतगर्दों की पुरज़ोर हिमायत,
बाहर आजा हिंद की तलवारअब म्यान से..(वीरेंद्र)/2-491


रचना: वीरेंद्र सींह "अजनबी"

1-870 बेइंतहा इंतज़ार किया,

बेइंतिहा इंतज़ार किया, मगर बेकार किया,
तुझे तो आना न था, खुद ही को बेज़ार किया..(वीरेंद्र)/1-870


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-869 उसके बगैर ऐ जिंदगी

उसके बगैर ऐ ज़िंदगी तेरा मक़सद अब रहा नहीं,
बेवजाह ही सही, चल मै तुझे कुछ और जी लेता हूँ..(वीरेंद्र)/1-869


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 22 January 2017

1-868 दर्द दिल का अब

दर्द दिल का अब कितना मुस्तक़िल हो गया, 
प्यार हुआ आसानी से, भूलना मुश्किल हो गया..(वीरेंद्र)/1-868


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 17 January 2017

1-867 शायरी पर मेरी,

शायरी पर मेरी, आए हर्फ़ बहुत हैं,
के इसमें खुशियां कम और दर्द बहुत हैं..(वीरेंद्र)/1-867


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 15 January 2017

2-486 मै जो जीवन-पर्यंत

मै जो जीवन-पर्यंत व्यथित हो मोह-पाक्ष में जकड़ा रहा,
अंतिम दौर में आकर अपनों ने मोह-मुक्त कर ही दिया..(वीरेंद्र)/2-486


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-485 न करो छोटी बात

न करो छोटी बात भी दिल दुखाने की,
छोटी सी को बड़ी बनते देर नहीं लगती..(वीरेंद्र)/2-485


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-490 बंद करो यार अब

बंद करो यार अब ये DNA टेस्ट,
बहुत घरों के पर्दे फ़ाश हो रहे हैं,
गरीब को कोई बाप कहता नहीं,
सब अमीरों की औलाद हो रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-490


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-586 तू संग-ऐ-इश्क पे

तू संग-ऐ-इश्क पे पिसी हुई हिना है,
मुहब्बतों से तराशा हुआ नगीना है,
मेरी अव्वलीन वाहिद ज़रुरत है तू,
मुझे साहिल पे लाती हुई सफ़ीना है..(वीरेंद्र)/0-586

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-585 मै कुछ अलैहदा

मैं कुछ अलैहदा हूँ इस ज़माने से,
पसीजता नहीं किसी के मनाने से,
मैं आइना हूँ, ढुलमुल इंसाँ नहीं,
बाज़ न आऊंगा सच्चाई बताने से..(वीरेंद्र)/0-585


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-479 गली गली लिए

गली गली लिए हुए हैं लोग पत्थर हाथ में,
रहनुमा खड़े हैं बद-अमली की फ़िराक में,
ख्वाब चकनाचूर हो गए जो देखे थे कभी,
मक़सदे-आज़ादी हम मिला रहे हैं ख़ाक़ में..(वीरेंद्र)/2-479


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-478 भ्रष्टाचार कहाँ नहीं,

भ्रष्टाचार कहाँ नहीं,
यह कोई नया नहीं, 
हम ही तो करते हैं,
बोलो हम कहाँ नहीं..(वीरेंद्र)/2-478


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-484 गरीबी से लड़ाई

गरीबी से लड़ाई लड़ते लड़ते गरीब और गरीब हो गए,
हासिल बस यह कि उनके रहनुमा और अमीर हो गए..(वीरेंद्र)/2-484


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 9 January 2017

1-866 मैंने फकत चाहा था

मैंने फ़क़त चाहा था उसे देखते रहना, चाहे वोे बेवफा हो जाए,
मैंने मांगी थी उसकी खुशियां, यूं न चाहा था वो जुदा हो जाए..(वीरेंद्र)/1-866


रचना: ©  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-865 ज़ख्म भर जाते हैं

ज़ख्म भर जाते हैं, मगर निशाँ छोड़ जाते हैं,
जो नहीं भरते, बनके नासूर साथ चले जाते हैं..(वीरेंद्र)/1-865


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 7 January 2017

2-483 वैसे तो मै सारी

वैसे तो मै सारी दुनियां को मैं माफ़ कर दूं
पर दिल दुखाने वाले को क्यों माफ़ कर दूं..(वीरेंद्र)/2-483


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 6 January 2017

0-584 बक्श दीं तूने

बख्श दीं तूने अपनी तमाम क़ूबतें, इंसा को,
बस रूह का फैसला अपने पास रख लिया।
देदी छूट इंसान को, कुदरत में भी दख्ल की,
पर इंतज़ामे-कायनात अपने पास रख लिया।.(वीरेंद्र)/०-584


© रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 5 January 2017

०-583 अब तो सचमुच फिकर

अब तो सचमुच फ़िकर सी होने लगी है,
बात जो कही थी उसने, पूरी होने लगी है।
ज़िंदगी मुकम्मल सी हो गयी थी जो कभी,
फिर से मगर अब अधूरी सी होने लगी है..(वीरेंद्र)/०-583


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-477 तने हुए यूकेलिप्टिस

तने हुए यूकेलिप्टस पेड़ के तने की तराह,
कडुए नीम के पेड़ पे चढ़े करेले की तराह,
कुछ लोग हर वक्त ही चढ़े चढ़े से रहते हैं,
बारात में आए हुए किसी बन्दे की तराह..(वीरेंद्र)/2-477


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-482 जिंदगी हर साल होती जा

ज़िन्दगी हर साल होती जा रही है छोटी, और यादें बड़ी,
कहानी के लिए हर पल जुड़ती जा रही है, कड़ी पे कड़ी..(वीरेंद्र)/2-482


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-469 भावनाओं को

भावनाओं को समझने के लिए भावुक मन चाहिए,
मुझे समझने लिए भी मेरे जैसा ही कोई जन चाहिए..(वीरेंद्र)/2-469


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-864 वश में होता गर

वश में होता गर वक्त पर मसलों को सुलझा लेना,
इस कदर ये ज़िन्दगियाँ उलझी सी न हुआ करतीं..(वीरेंद्र)/1-864


रचना:; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-863 नेक इंसानों को क्यों

नेक इंसानों को क्यों बुला लेता है तू अपने पास,
क्या हमारे हिस्से में तेरे नापसंदीदा ही लिक्खे हैं..(वीरेंद्र)/1-863


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-477 हमने बनाए थे चार 'अपने"

हमने बनाए थे चार 'अपने',
दो हमें न भाए, दो को हम रास नहीं आए।
किसको फली हैं नज़दीकियां,
ज़िंदगी के आड़े वक्त में काम, गैर ही आए..(वीरेंद्र)/2-477


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-862 इश्क के बीमार कहाँ

इश्क़ के बीमार कहाँ मरा करते हैं,
हमें देखो अभी तक जिए जा रहे हैं..(वीरेंद्र)/1-862

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"