Monday, 20 November 2017

2-548 उमीदें ही हमे मायूस

उम्मीदें ही हमे मायूस करती हैं,
मायूसी से ही उम्मीदें जगती हैं..(वीरेंद्र)/2-548


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-975 बेवफाओं के दिल कभी

बेवफाओं के दिल कभी तड़पा नहीं करते,
पत्थर मोम नहीं हैं वो कभी पिंघला नहीं करते..(वीरेंद्र)/1-975


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-974 मुहब्बत से डरने लगा

मुहब्बत से बहुत डरने लगा हूँ ,
कहीं कोई बेवफा न निकल जाय..(वीरेंद्र)/1-974


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-973 मेरे पास अब बची हैं

"मेरे पास अब बची हैं चंद सांसें,
क्यूँ न इन्हें भी तेरे ही नाम कर दूं"
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"




1-972 खुश रहना है तो

खुश रहना है तो दूसरों को भी तो खुश रहने दो,
खुद अपना ली खामोशी, दूसरों को तो कुछ कहने दो.(वीरेंद्र)/1-972


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-971 बेशक आप थे बेवफा

बेशक आप थे बेवफा, पर आपके तेवर इतने चढ़े तो न थे,
दुआ सलाम भी बंद हो जाय, हम कभी इतने बुरे तो न थे..(वीरेंद्र)/1-971


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-970 शनासाई न रास आई

"शनासाई न रास आई कभी मुझे, 
अपनों ने ही बनाया अजनबी मुझे"

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-969 बहुत दीं हो गए तुम कहाँ

बहुत दिन हो गए, तुम कहाँ खो गए,
तुम्हारे दिए ज़ख्म,फिर जवाँ हो गए..(वीरेंद्र)/1-969

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-555 मूर्ख बने हैं न कभी अल्लाह

मूर्ख बने हैं न कभी अल्लाह, न कभी राम,
चुनावी भक्तों से हैं ये दोनों ही सावधान,
जनता वाकिफ रग-रग से नोटंकीबाजों की,
बग़ल में रक्खें टोपी, मुंह से निकले राम।


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-547 नाटकीयता से न खुश हुआ

नाटकीयता से न खुश हुआ अल्लाह, न हुए भगवान,
कभी रखी सर पर टोपी, कभी पहुंच गए अक्षरधाम..(वीरेंद्र)/2-547


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-546 अब जब तु बदल ही

अब जब तू बदल ही गया मौसम,
तो कुछ देर ठहर भी जा, मौसम.
तेरे बहाने जो आ गईं कुछ बहारें,
चली न जाएं कहीं तेरे साथ मौसम..(विर्रेंद्र)/2-546

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 10 November 2017

1-968 इम्कान मुहब्बतों के कम,

इम्कान मुहब्बतों के कम, नफरतों के हज़ारों हैं,
माकूल सा चुन लो, बहाने भूल जाने के हजारों हैं..(वीरेंद्र)/1-968

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-612 दवा ख़त्म हो गयी,

दवा ख़त्म हो गई, मर्ज़ नहीं गया,
चोट ठीक हो गई, दर्द नहीं गया,
रुसवाईयाँ खत्म हो गईं जैसे तैसे,
मेरे नाम पर आया हर्फ़ नहीं गया..(वीरेंद्र)/0-612


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-545 तुम्हारे बगैर बड़ी कमी है

तुम्हारे बगैर बड़ी कमी है,
आंखें नम दिल मे गमी है,
तुम नहीं पसीजने वाले,
तुम में बस यही कमी है..(वीरेंद्र)/2-545


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-967 हमे न कहो बुझा चराग

हमे न कहो बुझा चराग़, हम अपने पीछे कई चराग़ जलाके आए हैं,
पूरी कर दीं हैं ख्वाहिशें औरों की हमने, अपनी मगर दफ़ना आए हैं.(वीरेंद्र)/1-967
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 4 November 2017

edit 966 दफ़न कर डी

दफन कर दीं हैं नफ़रतें हमने, ऐ दोस्त
असर इसका आज नहीं, आइंदा तो होगा।
"अजनबी"

1-965 तोड़ लो,या जोड़ लो

तोड़ लो, या जोड़ लो रिश्ते,
दर्द तो हर हाल में उठेगा ही..(वीरेंद्र)/1-965


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-964 ये कमबख्त याद भी

ये कमबख्त याद भी बड़ी ढीठ चीज़ है,
कितना भी दुत्कारो, आती ही रहती है..(वीरेंद्र)/1-964

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "आज्नाबी"

0-611 बहुत सर्द चल रही हैं

बहुत सर्द चल रही हैं हवाएं,
बड़ी रंगीन हो रही हैं फिजाएं,
तुम इतना दूर मत हो जाओ, 
गर्मजोशियों को हम तरस जाएं..(वीरेंद्र)/०-611

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-963 काश असल में भी होते

काश असल में भी होते उतने ही सीधे-सादे लोग,
तस्वीरों में दीखते हैं जितने सुंदर भोले-भाले लोग..(वीरेंद्र)/1-963

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-541 घोटालेबाजों की नीयत थी

घोटालेबाजों की नीयत थी गंदी,
दौलत कमा रक्खी थी अंधी,


मोदी निकला बहुत ही शातिर,
8 नवंबर को कर दी नोटबन्दी,


काले धन वाले कुबेर विचर रहे,
हो गई हो जैसे उनकी नसबंदी,


दारू संग भान रहे थे जो बोटी,
अब चबा रहे गाजर,शकरकंदी,


गुजरात हिमाचल हारते देख,
कर रहे टुचियल चुनावी संधि,


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-962 दिल को मान रैन बसेरा

दिल को मान रैन बसेरा,सुबह होते निकल जाते हैं लोग,
पहचान में भी आते नहीं, इस कदर बदल जाते हैं लोग..(वीरेंद्र)/1-962


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-961 माना तुम्हारा दिल है

माना तुम्हारा दिल है पत्थर का,
मगर यह तराशा क्यों नहीं जाता..(वीरेंद्र)/1-961

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-960 कभी हम भी आपसे

कभी हम भी आपसे बेरुखी दिखाएंगे,
आपको मालूम तो हो बेरुखी का दर्द क्या है..(वीरेंद्र)/1-960


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 26 October 2017

1-959 मैंने क्या खता की

मैने क्या ख़ता की मिल कर अपनी गुलफाम से,
छुपके झाड़ियों में सूरज भी तो मिलता है शाम से..(वीरेंद्र)/1-959

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-544 अब की बार जो चुनाव

अब की बार जो चुनाव आए,
हिन्दू हैं हमे बहुत याद आए,
उतार के हमने नकली टोपी,
कई मंदिरों में हैं शीश नवाए..(वीरेंद्र)/2-544


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 19 October 2017

1-958 आईना इंसान को सूरत


आईना इंसान को सूरत तो दिखाता है, पर सीरत नहीं,
मुहब्बत बगैर धड़कता दिल, दिल तो है, पर कीमत नहीं..(वीरेंद्र)/1-958

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-957 तेरी यादों को अब दिल

.
तेरी यादों को अब दिल से निकाल दिया मैंने,
ज़िन्दगी को यूं और भी तनहा बना लिया मैने..(वीरेंद्र)/1-957


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 18 October 2017

2-543 बात-बात में बातें बहुत

बात-बात में बातें बहुत कर लीं "ज़माने" की,
अब ज़रा कुछ बातें अपनी भी तो कर लूं।
मुंह फेर कर खड़ा रहूंगा कब तलक मैं,
अब रुख आईने की तरफ मैं भी तो कर लूं।.(वीरेंद्र)/2-543


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-956 बहुत दिन हो गए,

बहुत दिन हो गए, तुम कहाँ खो गए,
देखो, पुराने ज़ख्म फिर जवाँ हो गए..(वीरेंद्र)/1-956


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-955 मुझे गिला-शिकवा नहीं

मुझे गिला-शिकवा नहीं तेरे बदल जाने का,
बस इंतज़ार है वक्त के फिर बदल जाने का../1-955


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-95 किस कदर रूखे हैं

किस कदर रूखे हैं लोग,
सावन में भी सूखे हैं लोग,

न उन्सियत, न जज़्बात,
कितने आधे-अधूरे हैं लोग

नज़र भी है, जुबान भी है,
फिरभी बुत बने बैठे हैं लोग,

जिस राह का कोई छोर नहीं,
जाने क्यूं उसी पे खड़े हैं लोग,

दुनियां ने दे दिए तजुर्बे बहुत,
मगर अपनी सी पे अड़े हैं लोग..(वीरेंद्र)/3-95

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-540 किस कदर रूखे हैं

किस कदर रूखे हैं लोग,
सावन में भी सूखे हैं लोग,

न उन्सियत, न जज़्बात,
कितने आधे-अधूरे हैं लोग

नज़र भी है, जुबान भी है,
फिरभी बुत बने बैठे हैं लोग,

जिस राह का कोई छोर नहीं,
जाने क्यूं उसी पर खड़े हैं लोग,

दुनियां ने दे दिए तजुर्बे बहुत,
मगर अपनी सी पे अड़े हैं लोग..(वीरेंद्र)/2-540 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"


Sunday, 1 October 2017

2-539 You are mine from

You are mine from toe to head,
I am truly yours from A to Z,
Before I miss you for a minute,
Believe, I am completely dead..(वीरेंद्र)/2-539


रचना; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-954 मेरे ये मामूली से शेर

मेरे ये मामूली से शेर ग़ज़ल हो जाते,
अगर महफ़िल में कभी तुम आ जाते..(वीरेन्द्र)/1-954

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 25 September 2017

0-610 यूं तो बहुत तनहा है

यूं तो बहुत तन्हा है इंसाँ मगर,
मर ही जाता, गर यादों का सहारा न होता।
बड़े बे-रहम हैं ये दरिया रंजो-गम के,
कौन लड़ता इनसे गर इनका किनारा न होता।/0-610


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 24 September 2017

1-953 मै आगे आगे बढ़ता ही

मैं आगे आगे बढ़ता ही गया, क्यों मै रुका नहीं,
वहाँ दरियाऐ इश्क था, मुझे पता कैसे लगा नहीं..(वीरेंद्र)/1-953


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-538 कुछ निशाचरों की शाम

कुछ निशाचरों की शाम, रात ग्यारह बजे के बाद होती है,
मैं हैरान हूँ सोच कर, उनकी कब सुबह कब रात होती है।..(वीरेंद्र)/2-538


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 12 September 2017

2-537 मोटी चमड़ी वाले का इलाज

मोटी चमड़ी वाले का इलाज कोई नीम क्या करेगा,
खोटी हो नीयत तो इलाज कोई हकीम क्या करेगा..(वीरेंद्र)/2-537


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-952 काश असल में भी

काश असल में भी होते उतने ही अच्छे लोग,
तस्वीरों में दिखाई देते हैं जितने अच्छे लोग..(वीरेंद्र)/1-952


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-536 चाहे अपने मुल्क में,

चाहे अपने मुल्क में, मैं महफूज़ नहीं, तकलीफों के बगैर नहीं,
फिरभी मुल्क मेरा है,मेरे खानदान का है, किसी गैर का नहीं।


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-609 अपने ख्यालों को ज़हनियत

अपने ख्यालों को ज़हनियत दो,
रिश्ते-नातों को अहमियत दो,
खुद जैसे भी हो ठीक हो मगर 
अपनी औलादों को तरबियत दो..(वीरेंद्र)/0-609


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 8 September 2017

1-951 ये मेरा ही वहम है

ये मेरा ही वहम हैं, जो मुझे इस शहर में सता रहा है,
वर्ना यहाँ कौन है मेरा,जो "अजनबी" को बुला रहा है.(वीरेंद्र)/1-951

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-950 खुद ही बेवफा है

खुद ही बेवफा है, खुद ही ख़फ़ा है,
बद्दुआ न देंगे हम, उसे खूब पता है.(वीरेन्द्र)/1-950


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-608 बड़े वफादार हैं

बड़े वफादार हैं ये रंजो-ग़म मेरे,
ये कभी मुझसे नाराज़ नहीं होते,
उम्र ने तोड़ दिया मुझको, मगर
ये जवां हैं, उम्रदराज़ नहीं होते।(वीरेंद्र)/0-608


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-607 अब ज़िन्दगी बदजायका नहीं

अब ज़िन्दगी बदज़ायका नहीं लगती,
मैने यादों का अचार जो डाल लिया है।
अब गम भी मेरे पास नहीं फटकते,
मैने चंद खुशफहमियों को पाल लिया है। (वीरेंद्र)/0-607


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 12 August 2017

2-535 सारी दुनियां सोई होती है

सारी दुनिया सोई होती है, तब भी सूरज काम करता रहता है,
मौसम के कुफ्र में भी सरहद पर जवान काम करता रहता है...(वीरेंद्र)/2-535


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-535 मदारी बन जाऊंगा

मदारी बन जाऊंगा, गद्दार 'अंसारी' न बनूंगा,
बेगारी भले ही बन जाऊंगा 'अंसारी' न बनूंगा,
मुल्क से मैंने इज़्ज़त शोहरत दौलत सब पाया,
भिखारी भले ही बन जाऊं, 'अंसारी' न बनूंगा..(वीरेंद्र)/2-535


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-540 बूढ़े बकरे

बूढ़े बकरे जैसी शकल, 
फ्रांसीसियों  की नकल, 
ज़ुबाँ पर गिरा फालिज,
भैंस से बदतर अकल, 
नाशुकरा फैलाए घ्रणा, 
अमन-चैन में दे दखल,
जाने दो यारों उसे तुम,
सठियाया है दरअसल..(वीरेंद्र)/2-540


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी

1-949 देखके तुझे कभी कभी

देखके तुझे कभी कभी यूं लगा है ज़िन्दगी,
मुझसे यकीनन तुझे कोई गिला है ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/1-949


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 6 August 2017

2-532 आज तलक इतने साल

आज तलक इतने साल हो गए,
जैसे साल नहीं कई युग हो गए,

इस बीच बहुत लोग मिले,मगर,
कुछ खास जाने कहाँ खो गए..(वीरेंद्र)/2-532


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-948 ज़ख्मों को अपने जब

ज़ख्मों को अपने जब कभी हवा दी,
हर बार ही एक नई ग़ज़ल उभर आई..(वीरेंद्र)/1-948


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-534 देश के गद्दारों को

देश के गद्दारों को ठिकाने लगवा दो यार!
कभी तो इस बात का भी फतवा दो यार!..(वीरेंद्र)/2-534


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 31 July 2017

2-533 महज़ चंद तकलीफों

महज़ चंद तकलीफों पर ही इंसाँ ने खामखां हो-हल्ला मचा रक्खा है,
वो नहीं जानता ऊपर वाले ने उसे कितनी मुसीबतों से बचा रक्खा है..(वीरेंद्र)/2-533


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 29 July 2017

2-527 अच्छा हुआ फासले हो

अच्छा हुआ फ़ासले हो गए तो कुछ फैसले भी हो गए,
मंज़िल के पहले ही राहें बदलने के सिलसिले भी हो गए..(वीरेंद्र)/2-527


रचना: वीरेंद्र सिन्हा जो  "अजनबी"

2-531 कातिलों को इल्जाम

कातिलों को इल्ज़ाम न देना अगर ज़ालिमों का खून हो जाए,
और गुनाहगारों के खात्मे से माशरे में थोडा सा सुकून हो जाए,
ये हवालात, जेलें, अदालतें, जमानतें हो जाएंगी गैर-जरूरी,
अगर मौका-ऐ-वारदात पर ही सज़ा देने का कानून हो जाए..(वीरेंद्र)/2-531


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 27 July 2017

0-606 सारे ज़ख्म पुराने

सारे ज़ख्म पुराने बेअसर होते जा रहे हैं,
दोबारे से सब्ज़, ये शजर होते जा रहे हैं,
काट भी दोगे शाखों को अगर तुम लोगों,
ये न समझना परिंदे बेघर होते जा रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-506


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 19 July 2017

2-530 इस सरकार के अंध-विरोधी

इस सरकार के अंध-विरोधी,
जलन में हो रहे देश-विरोधी,
पूरे विश्व मे छाए मोदी-मोदी,
देश मे चिल्लाते चंद विरोधी..(वीरेंद्र)/2-530


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-526 देर न लगेगी कश्मीर को

देर न लगेगी कश्मीर में सब कुछ मिट जाने में,
देश अगर तुमने ज़िद की मसला ये लटकाने में..(वीरेंद्र)/2-526


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-947 तुम आकर कानों में

तुम आकर कानों में ऐसा क्या कह गए,
आंखें खुल गईं, अरमानों के आंसू बह गए..(वीरेंद्र)/1-947


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-946 हर बार ही दे देते हैं

हर बार ही दे देते हैं एक नया दर्द,
कह देते हैं दर्द ही तो है दवा-ऐ-दर्द..(वीरेंद्र)/1-946


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 5 July 2017

1-945 बेवफा हो जाएं वो, और

बेवफा हो जाएं वो, और इल्जाम-ऐ-बेवफाई मै भुगतूं,
ये कैसा इन्साफ, गुनाह करें वो, अंजाम मै भुगतूं..(वीरेंद्र)/1-945

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-944 यह माना, समेट दोगे

यह माना, समेट दोगे मुझे दो गज़ ज़मींन में,
पर मेरा आसमाँ तो तुम कम कर नहीं सकते..(वीरेंद्र)/1-944


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-525 मेरे मुल्क के गिद्ध भी

मेरे मुल्क के गिद्ध भी हर किसी को नहीं निगलते हैं,
वो भी जानते हैं इस धरती पर कुछ गद्दार भी पलते हैं..(वीरेंद्र)/2-525


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-943 ख्वाहिश,हसरत,आस,

ख्वाहिश, हसरत, आस, उम्मीद, आरज़ू और तमन्ना,
हर रोज़ लिख रहे हैं ये, ज़िन्दगी का एक और पन्ना..(वीरेंद्र)/1-943


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-524 हिकारत से न देख

हिक़ारत से न देख दहलीज़ के सवाली को,
न जाने कब किसका किरदार बदल जाये..(वीरेंद्र)/2-524


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-942 रफू से ऐब-ऐ-पैरहन

रफू से ऐब-ऐ-पैरहन दुनियां की निगाहों से छुप जाते हैं,
रिश्ते मगर रफू होते नहीं, हो भी जाएं तो बड़े सताते हैं,.(वीरेंद्र)/1-942

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-605 एहसास-ऐ-दर्द हो अगर

एहसास-ऐ-दर्द हो अगर इस दुनियां को,
तो आंसुओं के बहने की ज़रुरत क्या है.
जिनकीं आँखें ही हों एक खुली किताब,
उन्हें किताब लिखने की ज़रुरत क्या है..(वीरेंद्र)/०-605

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-941 मै बिखरा हुआ मोती नहीं,

मै बिखरा हुआ मोती नहीं जो तुम उठा लो बिखर जाने के बाद,
टूटा हुआ दिल हूँ, कोई कीमत नहीं जिसकी, टूट जाने के बाद..(वीरेंद्र)/1-941

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 27 June 2017

2-529 सियासतदानों, सियासती दांवपेंच

सियासतदानों, सियासती दांवपेंच क्यों चलाए रखते हो,
शांत शहर को और पुलिस थानों को जलाए रखते हो,
समझौता कोई होने नहीं देते सरकार और किसानों में,
शहरों से भीड़ लाकर गाँवों में, मौहाल गरमाए रखते हो..(वीरेंद्र)/2-529

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-940 वो लम्हा जो तेरे साथ

वो लम्हा जो तेरे साथ गुज़रा ही नहीं,
क्यों मैं उसका तस्सव्वुर किये बैठा हूँ..(वीरेंद्र)/1-940


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-939 आँखों से जो

आंखों से जो शराब पिलाते हैं,
वो ही मुझको शराबी बताते हैं..(वीरेंद्र)/1-939


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 17 June 2017

0-603 पूरी किताब को मेरी

पूरी किताब को मेरी पढ़ लिया उसने,
उसके एक पन्ने को मोड़ दिया उसने,
ज़बरदस्त  पैनी नज़र थी ज़ालिम की,

मेरी दुखती रग को ताड़ लिया उसने..(वीरेंद्र)/०-603

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-523 मुझसे लिखवा लिया वो,

मुझसे लिखवा लिया वो, जो मैं लिखना नहीं चाह रहा था,
लोगों ने अर्थ निकाल लिया वो, जो मैं कहना नहीं चाह रहा था..(वीरेंद्र)/2-523


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"-

1-938 जैसे चाहा उसने

जैसे चाहा उसने, वैसे मैंने ये ज़िन्दगी बिता दी,
सुकूँ न मिला, गो मैने उसकी कीमत भी चुका दी..(वीरेंद्र)/1-938


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-528 भावनाएं किसी काम की

भावनाएं किसी काम की नहीं, ये कभी समझी नहीं जा सकतीं.,
शब्द-भण्डार कम पड़ जाते हैं, कभी व्यक्त की नहीं जा सकतीं,
दिल से निकाल कर फेंक देना ही अच्छा है इनका इस ज़माने में,
ऐसा भी नहीं है कि जिंदगियां इनके बिना जी नहीं जा सकतीं ..(वीरेंद्र)/2-528

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-522 भारतमाता हम तुझसे

भारत माता हम तुझसे शर्मिंदा हैं,
तेरे दोषी इतनी शान से जिंदा हैं..(वीरेंद्र)/2-522

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-937 कुछ लोग सामान-ऐ-

कुछ लोग सामान-ऐ-दिलबस्तगी होते हैं,
नहीं रहते जब काम के, तो अजनबी होते हैं..(वीरेंद्र)/1-937

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-936 वो शेर ही क्या जिसमे

वो शेर ही क्या जिसमे जज़्बात की ऊंचाई न हो,
वो ख्याल ही क्या जिसमे दम और गहराई न हो..(वीरेंद्र)/1-936

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 11 June 2017

1-935 तेरा उसे भूल जाना

उसको भूल जाना तेरे लिए नामुमकिन था ऐ "अजनबी",
शुक्र मना वो खुद ही बदल गया और ये मुमकिन हो गया..(वीरेंद्र)/1-935

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-934 बड़ा कहती थी मुझसे

बड़ा कहती थी मुझसे, "मुझे भूल जा", "मुझे भूल जा",
ले मेने तुझे भुला दिया, अब तु भी ज़रा मुझे भूल के दिखा..(वीरेंद्र)/1-934

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 18 May 2017

1-931 मै भी वही, तुमभी वही

मै भी वही, तुम भी वही, दुनियां में सभी कुछ वही,
फिरभी करीने से बदल डाला प्यार का मंज़र तुमने..(वीरेंद्र)/1-931


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-511 तेरे आने की खबर

तेरे आने की खबर जबसे आई है,
उदास ज़िन्दगी ने ली अंगड़ाई है,
बदली बदली सी है हर कोई शय,
कुदरत भी अजब रंग में नहाई है..(वीरेंद्र)/2-511


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 17 May 2017

1-929 वो प्यार, प्यार ही क्या

वो प्यार, प्यार ही क्या, जिसमे आँखें नम न हों,
वो भला निखरेगा क्या, अगर उसमे ग़म न हों..(वीरेंद्र)/1-929

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 15 May 2017

1-928 वक्त-ऐ-दौरां में एहसास

वक्त-ऐ-दौरां में एहसास-ओ-जज़्बात दिलों से ऐसे निकल गए,
पता नहीं चलता जिंदगी में कौन आए, कब और कैसे निकल गए..(वीरेंद्र)/1-928

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






1-930 दुनियां-जहाँ को ज़ख्म न दिखा,

दुनियां-जहाँ को ज़ख्म न दिखा, सबके पास "मरहम" नहीं होता,
नमक छिड़क देते हैं लोग उनपर, उनको कोई भी गम नहीं होता..(वीरेंद्र)/1-930

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

0-602 परिंदे गए, घोंसला

परिंदे गए, घोंसला खाली है,
होरही उदास डाली-डाली है,
पत्ता-पत्ता थरथराने लगा है,
शायद, खिज़ा आने वाली है..(वीरेंद्र)/0-602


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 13 May 2017

1-927 वो थक-हार गए दूर

वो थक-हार गए दूर मंज़िल से होते गए,
जो लोग जब जी चाहा, रास्ते बदलते गए..(वीरेंद्र)/1-927


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-926 पता नहीं मकतल पर

पता नहीं मक़तल पर हूँ कि मैखाने पर हूँ
अब जहां भी हूँ, बस मैं तेरे निशाने पर हूँ..(वीरेंद्र)/1-926


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-925 या तो देदे मुझे जिंदगी

या तो देदे मुझे ज़िन्दगी दुबारा से मेरे मालिक,
या फिर मेरे तजुर्बों में अब कोई इजाफा न कर..(वीरेंद्र)/1-925

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 9 May 2017

2-520 बिगाड़ सका है क्या,

बिगाड़ सका है क्या, भला कोई कानून उसका,
कालेधन से बन चुका हो कुबेर, कुनबा जिसका..(वीरेंद्र)/2-520

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 7 May 2017

1-924 मै नहीं कहता मुझसे

मैं नहीं कहता मुझसे कोई राब्ता रख,
परअपनी खैरियत से तो महरूम न कर..(वीरेंद्र)/1-924


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-922 तु पत्थर थी, मै भी

तू पत्थर थी, मै भी पत्थर हो गया हूँ,
तू एक प्रश्न थी, मै तेरा उत्तर हो गया हूँ. (वीरेंद्र)/1-922

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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Wednesday, 3 May 2017

2-519 हर इंसान खुद ही

हर इंसान खुद ही खोया हुआ है कहीं,
और पूछता है ये इंसान कहाँ खो गए..(वीरेंद्र)/2-519

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-923 तेरे आने से भी कम

तेरे आने से भी कम न होंगे मेरे ग़म,
एक तन्हाई ही तो बस मेरा ग़म नहीं..(वीरेंद्र)/1-923


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 1 May 2017

0-598 झूंटे लोग जिनको

झूंटे लोग जिनको पसंद नहीं आते हैं,
दुनियां में ऐसे लोग तनहा रह जाते हैं,
बड़े नाज़ुक मिजाज़ होते हैं वो बेचारे,
लफ़्ज़ों से नहीं, लहजों से मर जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-598

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 28 April 2017

2-518 बड़ी बात छोटे मुंह से

बड़ी बात छोटे मुंह से अच्छी नहीं लगती,
जब किसी से एक चींटी भी नहीं मरती.(वीरेंद्र)/2-518


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-510 दुश्मन के सर उडाए

दुश्मन के सर उड़ाए नहीं, तो झुकाए तो जा सकते हैं,
पड़ोसी अगरचे बदले नहीं, तो सुधारे तो जा सकते हैं.

शहीदों पर दुश्मन के हमलों की मज़म्मत है नाकाफी,
नाकारा हों अगर हुक्मरां, तो हटाये तो जा सकते हैं..(वीरेंद्र)/2-510


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-921 ऐसे वक्त अपने रास्ते

ऐसे वक्त अपने रास्ते बदल लिए तुमने,
तुम्हे लेके जब कई ख्वाब थे बुन लिए मैंने..(वीरेंद्र)/1-921


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 24 April 2017

0-597 चुराए जा सकते हैं हीरे

चुराए जा सकते हैं हीरे जवाहरात मेरी शायरी के,
इल्म, हुनर, ख्यालात मेरे चुराए नहीं जा सकते,
चुराके पढ़े तो जा सकते हैं महफिलों में मेरे शेर,
दिलो-जिगर में हाज़रीन के उतारे नहीं जा सकते.(वीरेंद्र)/0-597

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 22 April 2017

2-517 हम औरतें अपने हकूक

हम औरतें अपने हक़ूक़ के खूं का तस्करा भी न करें,
अक्लियतें उनका क़त्ल कर दें और हम चर्चा भी न करें..(वीरेंद्र)/2-517

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-920 तुम्हारे बगैर बस यह

तुम्हारे बगैर बस यह ज़िन्दगी सरक रही है,
बुझने से पहले लौ चराग की भड़क रही है..(वीरेंद्र)/1-920

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"