Wednesday, 19 July 2017

2-530 इस सरकार के अंध-विरोधी

इस सरकार के अंध-विरोधी,
जलन में हो रहे देश-विरोधी,
पूरे विश्व मे छाए मोदी-मोदी,
देश मे चिल्लाते चंद विरोधी..(वीरेंद्र)/2-530


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-526 देर न लगेगी कश्मीर को

देर न लगेगी कश्मीर में सब कुछ मिट जाने में,
देश अगर तुमने ज़िद की मसला ये लटकाने में..(वीरेंद्र)/2-526


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-947 तुम आकर कानों में

तुम आकर कानों में ऐसा क्या कह गए,
आंखें खुल गईं, अरमानों के आंसू बह गए..(वीरेंद्र)/1-947


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-946 हर बार ही दे देते हैं

हर बार ही दे देते हैं एक नया दर्द,
कह देते हैं दर्द ही तो है दवा-ऐ-दर्द..(वीरेंद्र)/1-946


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 5 July 2017

1-945 बेवफा हो जाएं वो, और

बेवफा हो जाएं वो, और इल्जाम-ऐ-बेवफाई मै भुगतूं,
ये कैसा इन्साफ, गुनाह करें वो, अंजाम मै भुगतूं..(वीरेंद्र)/1-945

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-944 यह माना, समेट दोगे

यह माना, समेट दोगे मुझे दो गज़ ज़मींन में,
पर मेरा आसमाँ तो तुम कम कर नहीं सकते..(वीरेंद्र)/1-944


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-525 मेरे मुल्क के गिद्ध भी

मेरे मुल्क के गिद्ध भी हर किसी को नहीं निगलते हैं,
वो भी जानते हैं इस धरती पर कुछ गद्दार भी पलते हैं..(वीरेंद्र)/2-525


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-943 ख्वाहिश,हसरत,आस,

ख्वाहिश, हसरत, आस, उम्मीद, आरज़ू और तमन्ना,
हर रोज़ लिख रहे हैं ये, ज़िन्दगी का एक और पन्ना..(वीरेंद्र)/1-943


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-524 हिकारत से न देख

हिक़ारत से न देख दहलीज़ के सवाली को,
न जाने कब किसका किरदार बदल जाये..(वीरेंद्र)/2-524


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-942 रफू से ऐब-ऐ-पैरहन

रफू से ऐब-ऐ-पैरहन दुनियां की निगाहों से छुप जाते हैं,
रिश्ते मगर रफू होते नहीं, हो भी जाएं तो बड़े सताते हैं,.(वीरेंद्र)/1-942

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-605 एहसास-ऐ-दर्द हो अगर

एहसास-ऐ-दर्द हो अगर इस दुनियां को,
तो आंसुओं के बहने की ज़रुरत क्या है.
जिनकीं आँखें ही हों एक खुली किताब,
उन्हें किताब लिखने की ज़रुरत क्या है..(वीरेंद्र)/०-605

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-941 मै बिखरा हुआ मोती नहीं,

मै बिखरा हुआ मोती नहीं जो तुम उठा लो बिखर जाने के बाद,
टूटा हुआ दिल हूँ, कोई कीमत नहीं जिसकी, टूट जाने के बाद..(वीरेंद्र)/1-941

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 27 June 2017

2-529 सियासतदानों, सियासती दांवपेंच

सियासतदानों, सियासती दांवपेंच क्यों चलाए रखते हो,
शांत शहर को और पुलिस थानों को जलाए रखते हो,
समझौता कोई होने नहीं देते सरकार और किसानों में,
शहरों से भीड़ लाकर गाँवों में, मौहाल गरमाए रखते हो..(वीरेंद्र)/2-529

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-940 वो लम्हा जो तेरे साथ

वो लम्हा जो तेरे साथ गुज़रा ही नहीं,
क्यों मैं उसका तस्सव्वुर किये बैठा हूँ..(वीरेंद्र)/1-940


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-939 आँखों से जो

आंखों से जो शराब पिलाते हैं,
वो ही मुझको शराबी बताते हैं..(वीरेंद्र)/1-939


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 17 June 2017

0-603 पूरी किताब को मेरी

पूरी किताब को मेरी पढ़ लिया उसने,
उसके एक पन्ने को मोड़ दिया उसने,
ज़बरदस्त  पैनी नज़र थी ज़ालिम की,

मेरी दुखती रग को ताड़ लिया उसने..(वीरेंद्र)/०-603

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-523 मुझसे लिखवा लिया वो,

मुझसे लिखवा लिया वो, जो मैं लिखना नहीं चाह रहा था,
लोगों ने अर्थ निकाल लिया वो, जो मैं कहना नहीं चाह रहा था..(वीरेंद्र)/2-523


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"-

1-938 जैसे चाहा उसने

जैसे चाहा उसने, वैसे मैंने ये ज़िन्दगी बिता दी,
सुकूँ न मिला, गो मैने उसकी कीमत भी चुका दी..(वीरेंद्र)/1-938


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-528 भावनाएं किसी काम की

भावनाएं किसी काम की नहीं, ये कभी समझी नहीं जा सकतीं.,
शब्द-भण्डार कम पड़ जाते हैं, कभी व्यक्त की नहीं जा सकतीं,
दिल से निकाल कर फेंक देना ही अच्छा है इनका इस ज़माने में,
ऐसा भी नहीं है कि जिंदगियां इनके बिना जी नहीं जा सकतीं ..(वीरेंद्र)/2-528

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-522 भारतमाता हम तुझसे

भारत माता हम तुझसे शर्मिंदा हैं,
तेरे दोषी इतनी शान से जिंदा हैं..(वीरेंद्र)/2-522

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-937 कुछ लोग सामान-ऐ-

कुछ लोग सामान-ऐ-दिलबस्तगी होते हैं,
नहीं रहते जब काम के, तो अजनबी होते हैं..(वीरेंद्र)/1-937

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-936 वो शेर ही क्या जिसमे

वो शेर ही क्या जिसमे जज़्बात की ऊंचाई न हो,
वो ख्याल ही क्या जिसमे दम और गहराई न हो..(वीरेंद्र)/1-936

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 11 June 2017

1-935 तेरा उसे भूल जाना

उसको भूल जाना तेरे लिए नामुमकिन था ऐ "अजनबी",
शुक्र मना वो खुद ही बदल गया और ये मुमकिन हो गया..(वीरेंद्र)/1-935

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-934 बड़ा कहती थी मुझसे

बड़ा कहती थी मुझसे, "मुझे भूल जा", "मुझे भूल जा",
ले मेने तुझे भुला दिया, अब तु भी ज़रा मुझे भूल के दिखा..(वीरेंद्र)/1-934

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 18 May 2017

1-931 मै भी वही, तुमभी वही

मै भी वही, तुम भी वही, दुनियां में सभी कुछ वही,
फिरभी करीने से बदल डाला प्यार का मंज़र तुमने..(वीरेंद्र)/1-931


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-511 तेरे आने की खबर

तेरे आने की खबर जबसे आई है,
उदास ज़िन्दगी ने ली अंगड़ाई है,
बदली बदली सी है हर कोई शय,
कुदरत भी अजब रंग में नहाई है..(वीरेंद्र)/2-511


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 17 May 2017

1-929 वो प्यार, प्यार ही क्या

वो प्यार, प्यार ही क्या, जिसमे आँखें नम न हों,
वो भला निखरेगा क्या, अगर उसमे ग़म न हों..(वीरेंद्र)/1-929

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 15 May 2017

1-928 वक्त-ऐ-दौरां में एहसास

वक्त-ऐ-दौरां में एहसास-ओ-जज़्बात दिलों से ऐसे निकल गए,
पता नहीं चलता जिंदगी में कौन आए, कब और कैसे निकल गए..(वीरेंद्र)/1-928

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"






1-930 दुनियां-जहाँ को ज़ख्म न दिखा,

दुनियां-जहाँ को ज़ख्म न दिखा, सबके पास "मरहम" नहीं होता,
नमक छिड़क देते हैं लोग उनपर, उनको कोई भी गम नहीं होता..(वीरेंद्र)/1-930

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

0-602 परिंदे गए, घोंसला

परिंदे गए, घोंसला खाली है,
होरही उदास डाली-डाली है,
पत्ता-पत्ता थरथराने लगा है,
शायद, खिज़ा आने वाली है..(वीरेंद्र)/0-602


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 13 May 2017

1-927 वो थक-हार गए दूर

वो थक-हार गए दूर मंज़िल से होते गए,
जो लोग जब जी चाहा, रास्ते बदलते गए..(वीरेंद्र)/1-927


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-926 पता नहीं मकतल पर

पता नहीं मक़तल पर हूँ कि मैखाने पर हूँ
अब जहां भी हूँ, बस मैं तेरे निशाने पर हूँ..(वीरेंद्र)/1-926


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-925 या तो देदे मुझे जिंदगी

या तो देदे मुझे ज़िन्दगी दुबारा से मेरे मालिक,
या फिर मेरे तजुर्बों में अब कोई इजाफा न कर..(वीरेंद्र)/1-925

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 9 May 2017

2-520 बिगाड़ सका है क्या,

बिगाड़ सका है क्या, भला कोई कानून उसका,
कालेधन से बन चुका हो कुबेर, कुनबा जिसका..(वीरेंद्र)/2-520

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 7 May 2017

1-924 मै नहीं कहता मुझसे

मैं नहीं कहता मुझसे कोई राब्ता रख,
परअपनी खैरियत से तो महरूम न कर..(वीरेंद्र)/1-924


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-922 तु पत्थर थी, मै भी

तू पत्थर थी, मै भी पत्थर हो गया हूँ,
तू एक प्रश्न थी, मै तेरा उत्तर हो गया हूँ. (वीरेंद्र)/1-922

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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Wednesday, 3 May 2017

2-519 हर इंसान खुद ही

हर इंसान खुद ही खोया हुआ है कहीं,
और पूछता है ये इंसान कहाँ खो गए..(वीरेंद्र)/2-519

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-923 तेरे आने से भी कम

तेरे आने से भी कम न होंगे मेरे ग़म,
एक तन्हाई ही तो बस मेरा ग़म नहीं..(वीरेंद्र)/1-923


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 1 May 2017

0-598 झूंटे लोग जिनको

झूंटे लोग जिनको पसंद नहीं आते हैं,
दुनियां में ऐसे लोग तनहा रह जाते हैं,
बड़े नाज़ुक मिजाज़ होते हैं वो बेचारे,
लफ़्ज़ों से नहीं, लहजों से मर जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-598

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 28 April 2017

2-518 बड़ी बात छोटे मुंह से

बड़ी बात छोटे मुंह से अच्छी नहीं लगती,
जब किसी से एक चींटी भी नहीं मरती.(वीरेंद्र)/2-518


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-510 दुश्मन के सर उडाए

दुश्मन के सर उड़ाए नहीं, तो झुकाए तो जा सकते हैं,
पड़ोसी अगरचे बदले नहीं, तो सुधारे तो जा सकते हैं.

शहीदों पर दुश्मन के हमलों की मज़म्मत है नाकाफी,
नाकारा हों अगर हुक्मरां, तो हटाये तो जा सकते हैं..(वीरेंद्र)/2-510


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-921 ऐसे वक्त अपने रास्ते

ऐसे वक्त अपने रास्ते बदल लिए तुमने,
तुम्हे लेके जब कई ख्वाब थे बुन लिए मैंने..(वीरेंद्र)/1-921


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 24 April 2017

0-597 चुराए जा सकते हैं हीरे

चुराए जा सकते हैं हीरे जवाहरात मेरी शायरी के,
इल्म, हुनर, ख्यालात मेरे चुराए नहीं जा सकते,
चुराके पढ़े तो जा सकते हैं महफिलों में मेरे शेर,
दिलो-जिगर में हाज़रीन के उतारे नहीं जा सकते.(वीरेंद्र)/0-597

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 22 April 2017

2-517 हम औरतें अपने हकूक

हम औरतें अपने हक़ूक़ के खूं का तस्करा भी न करें,
अक्लियतें उनका क़त्ल कर दें और हम चर्चा भी न करें..(वीरेंद्र)/2-517

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-920 तुम्हारे बगैर बस यह

तुम्हारे बगैर बस यह ज़िन्दगी सरक रही है,
बुझने से पहले लौ चराग की भड़क रही है..(वीरेंद्र)/1-920

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-919 आतिशे-नफरत में न जल

आतिशे-नफरत में न जल इतना भी,
कि मुहब्बतें भी तुझको बचा न सकें..(वीरेंद्र)/1-919

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-918 ख्यालात की दौलत रखने

ख्यालात की दौलत रखने वाले, लफ़्ज़ों की फ़िज़ूलख़र्ची नहीं करते,
सलाहियतों के होते हैं वो कद्रदान, ज़ाहिरी खूबसूरती पर नहीं मरते..(वीरेंद्र)/-918


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 17 April 2017

2-516 गद्दारों की गद्दारी, वतनपरस्त

गद्दारों की गद्दारी, वतनपरस्त कभी ना बर्दाश्त करेंगे,
उठा लेंगे शमशीर खुद ही, गर हुक्मरां नज़रंदाज़ करेंगे..(वीरेंद्र)/2-516


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-917 दिल तोड़ने का मुकाबला


दिल तोड़ने का मुकाबला, मै उस पत्थर-दिल से न कर पाऊंगा,

वो तो मेरा दिल तोड़ देगा झटसे, मै उसका दिल तोड़ न पाऊंगा..(वीरेंद्र)/1-917

रचना; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-916 कुछ चराग आंधियों ने

कुछ चराग़ आंधियों में बुझ गए कुछ हम बुझाए बैठे हैं,
फिर भी जाने क्यों उजालों की आस हम लगाए बैठे हैं..(वीरेंद्र)/1-916


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-915 मेरे जज़्बात मेरे एहसासात

मेरे जज़्बात मेरे एहसासात, मैं तुमसे शर्मिंदा हूँ,
बहुत मजबूर हूँ, तुम्हे मार कर भी मैं ज़िंदा हूँ..(वीरेंद्र)/1-915

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-515 काश छोटा मोटा "पुरूस्कार"

काश छोटा मोटा सा कोई "पुरुस्कार" हमे भी मिल गया होता, 
असहिष्णुता पर उसे लौटाने का मौका यार हमे भी मिल गया होता.(वीरेंद्र)/2-515


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-509 कोई हर्ज नहीं है

कोई हर्ज नहीं है, ऐतराज़ में,
मगर दम न लगा आवाज़ में,
हलक पर तू इतना ज़ोर न दे,
ताकत पैदा कर अल्फ़ाज़ में..(वीरेंद्र)/2-509


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-914 वापस लौट आए हैं तमाम

वापस लौट आए हैं तमाम रंज-ओ-गम मेरे,
खोए हुओं की बड़ी तलाश जो रहती थी मुझे.(वीरेंद्र)/1-914


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

Wednesday, 12 April 2017

0-596 तुमको देखा नहीं बहुत

तुमको देखा नहीं बहुत दिनों से,
कुछ लिक्खा नहीं बहुत दिनों से,
जाने कब पूरी होगी मेरी ग़ज़ल,
दर्द कोई उठा नहीं बहुत दिनों से..(वीरेंद्र)/0-596


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-913 आ तेरा नाम मै "तन्हाई"

आ तेरा नाम मैं 'तन्हाई' रख दूं,
तू रहेगी पास, जाने के बाद भी.(वीरेंद्र)/1-913

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-595 पत्थर दिल कभी ग़मज़दा

पत्थरदिल कभी ग़मज़दा नहीं होता,
गैर-जज़्बाती कभी तन्हा नहीं होता,
एहसासात का मारा हुआ मेरा दिल,
'अजनबी' ही रहा शनासा नहीं होता..(वीरेंद्र)/0-595


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-912 आज अगर कोई नया

आज अगर कोई नया-नया दर्द मिल जाय,
पुराने किसी दर्द को सुकूँ शायद मिल जाय..(वीरेंद्र)/1-912


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-514 सब मिथ्या है जो है

सब मिथ्या है जो है जग-बीती,
सत्य वही है जो है आप-बीती..(वीरेंद्र)/2-514


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 5 April 2017

1-911 बेदर्द हैं लोग,

बेदर्द हैं लोग, शक-ओ-शुबहा में उंगली उठाते हैं,
जाने क्यों मुहब्बत का मतलब वो एक ही लगाते हैं..(वीरेंद्र)/1-911

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-910 फिर से कोई दर्द

फिर से कोई दर्द, सर उठा रहा है,
कौन है जो इसे शह देके जा रहा है..(वीरेंद्र)/1-910

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-594 और भी बड़े इम्तिहान

और भी बड़े इम्तिहान होने हैं इश्क के,
दर्द सहने की कूबत को हमें आज़माना है
हमही ने मोड़ा है रुख कश्ती का उधर,
जिधर से तूफान को समुंदर में आना है..(वीरेंद्र)/0-594

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-909 न तेरा ज़िक्र किया इसमें,

न तेरा ज़िक्र किया इसमें, न तेरा नाम लिया,
किस पर लिखी ग़ज़ल मैने, सबने जान लिया..(वीरेंद्र)/1-909


रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

1-908 ज़रा सो उन्सियत

ज़रा सी उन्सियत क्या हुई उनसे, ज़माने ने मुहब्बत का नाम दे दिया,
ज़रा सी आँख क्या मिलीं उनसे, लोगों ने मुलाक़ात का नाम दे दिया..(वीरेंद्र)/1-908


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 31 March 2017

1-907 बहु और बेटे को

बहु और बेटे को बूढ़े बाप का इतना ख्याल रहता है,
बेटा अपने बाप को एक बिल्डिंग छोड़कर रखता है..(वीरेंद्र)/1-907


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-906 बुढापे का माकूल एहसास

बुढ़ापे का माकूल एहसास नहीं होता खुदके बूढ़े होने तक,
जवान औलाद से कोई तवक्को न रख उनके बूढ़े होने तक..(वीरेंद्र)/1-906


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-905 मै वाकिफ हूँ मयकशी

मैं वाकिफ़ हूँ मयकशी के ख़ौफ़नाक नतीजों से,
इसीलिए मुझे खुद से ज़्यादा मआशरे की फ़िक्र है..(वीरेंद्र)/1-905


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 29 March 2017

2-513 मानते हैं सब ही

मानते हैं सब ही, मन स्थिर नहीं चंचल होता है,
तो कोई बताए हमें 'मनचला' बुरा कैसे होता है..(वीरेंद्र)/2-513


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-508 यू.पी. में ये कैसी घिनौनी

यू.पी. में ये कैसी घिनौनी राजनीती की जा रही है,
मजनू राँझा महिवाल की अनदेखी की जा रही है,
मनचलों के खिलाफ "एंटी रोम्यो स्क्वाड" बनाकर,  

सिर्फ रोमियो को क्यूँ इतनी तरजीह दी जारही है..(वीरेंद्र)/2-508

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-904 मुझसे मुहब्बत नहीं

मुझसे मुहब्बत नहीं, तो जुदा होके रोया क्यों था,
सींचना नहीं था, तो इस पौधे को बोया क्यों था..(वीरेंद्र)/1-904


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 28 March 2017

1-903 नादाँ था सवाल करता

नादाँ था सवाल करता गया, ख़ामोशी को समझ ना सका,
साथ साथ चला, फिर भी मेरी धड़कनों को सुन ना सका.(वीरेंद्र)/1-903


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-502 'विवाद' की जड़ में बस

'विवाद' की जड़ में बस ज़िद तेरी है और मेरी है,
वरना तो मुद्दे में कोई रूचि, ना तेरी है न मेरी है..(वीरेंद्र)/2-502


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-507 नेकी, इंसानियत की राह

नेकी, इंसानियत की राह में रोड़े आते हैं,
कई मासूमों के नेक दिल तोड़े जाते हैं,
भाई चारा दुनियां से ना उठा है न उठेगा,
कुछ लोग बस यूँ ही मूछें मरोड़े जाते हैं..(वीरेंद्र)/2-507


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-902 ज़िन्दगी तेरे लिय ही

ज़िन्दगी तेरे लिए ही सपने मैं सजाए रखता हूँ,
तू है उधार की फिरभी सीने से लगाए रखता हूँ..(वीरेंद्र)/1-902


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-501 इधर न निगाह डालो

इधर न निगाह न डालो ख़िज़ाओं मेरा मुल्क रंगबिरंगा बगीचा है,
यूँही नहीं फूल खिले हैं इसमें, शहीदों ने अपने खूँ से इसे सींचा है..(वीरेंद्र)/2-501


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-901 हम ही कर देते हैं

हम ही कर देते हैं क़त्ल रिश्तों का,
वरना तो मौत से भी वो मरा नहीं करते..(वीरेंद्र)/1-901


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-900 ना ख़ुशी कुछ है,

ना खुशी कुछ है, ना ग़म कुछ है,
वक्त का मिज़ाज़ ही सब कुछ है..(वीरेंद्र)/1-900


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-899 चुपके से सिर्फ देखते

चुपके से सिर्फ देखते हो कभी मिला भी करो,
आँखों में सिर्फ झांकते हो कभी बसा भी करो..(वीरेंद्र)/1-899

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 27 March 2017

0-593 तुझे अगर मुझसे मुहब्बत

तुझे अगर मुझसे मुहब्बत नहीं,
तो बता जुदा होकर रोया क्यों था,
सींचना नहीं था इस पौधे को,
तो भला तुमने उसे बोया क्यों था..(वीरेंद्र)/0-593


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 21 March 2017

1-898 मेरे बुरे वक्त

मेरे बुरे वक्त मेरा बुरा न मान, तुझे बुरा कहने पर,
याद रख, मै ही याद करूंगा तुझे, तेरे ना रहने पर..(वीरेंद्र)/1-898

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-897 ये आवाज़ यकीनन

ये आवाज़ यकीनन उसके दिल की नहीं,
पत्थर भी कहीं इस तरह धड़का करते हैं..(वीरेंद्र)/1-897


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-592 आपको ज़रा बेवफा

आपको ज़रा बेवफा क्या कह दिया,
आपने तो हाथ में हमें आईना दे दिया।
देखता हूँ बस तुम्हारी ही सूरत इसमें,
तुमने कौनसा मुझे ये आइना दे दिया।..(वीरेंद्र)/0-592


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-896 शानों पर बिखरी

शानों पर बिखरी आपकी ये ज़ुल्फ़ें गुलबर्ग लगती हैं,
नाज़ां हूँ दीद पर, आप सर से पांव गुलमर्ग लगती हैं..(वीरेंद्र)/1-896


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-506 पिछड़ेपन के खिलाफ

पिछड़ेपन के खिलाफ आए दिन हम पुरज़ोर आवाज़ें उठाते हैं,
और हम ही हैं जो रोज़-रोज़ विकास की राह में रोड़े अटकाते हैं।
कारवां-ऐ-तरक्की थमता नहीं किसी भी सूरत में, ये समझ लो,
हम लोग जब थक जाते हैं, तो दूसरे लोग कदम आगे बढ़ाते हैं।..(वीरेंद्र)/2-506

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 16 March 2017

1-895 न्यामते-खुदा की शक्ल में


न्यामते-खुदा की शक्ल में मेरे पास मेरे दर्द तो हैं,
गर मेरे दामन  में नहीं खुशियाँ, मेरे इर्द-गिर्द तो हैं,.(वीरेंद्र)/1-895

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 8 March 2017

1-894 हवा के झोंके मेरे चराग

हवा के झोंके मेरे चराग़ को ज़्यादा देर जलने नहीं देंगे,
तू भी चली जा ख़ुशी, मेरे गम तुझे और यहाँ रहने नहीं देंगे..(वीरेंद्र)/1-894


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 1 March 2017

2-505 देश की ख़ातिर फूटी कौड़ी

देश की ख़ातिर फूटी कौड़ी भी न देते जो, 
उनको देश से हर वक्त बस खैरात चाहिए, 
काला धन देश के खजाने में आए न आए,
पहले उन्हें फोकट का 15-15 लाख चाहिए..(वीरेंद्र)/2-505


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-893 किस गुज़रे वाकये

किस गुज़रे वाकिये की याद दिला दी थी मैंने,
जो मेरे खत को लौटा दिया किर्चे-किर्चे करके..(वीरेंद्र)/1-893


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-892 कर दिया दाखिल उसने

कर दिया दाखिल उसने, वृद्धाश्रम में उन्हें ले जा कर,
बेशुमार शेर जिसने लिख दिए थे खिदमते-माँ-बाप पर..(वीरेंद्र)/1-892


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-891 मांग ली मन्नत खोटा

मांग ली मन्नत खोटा सिक्का भगवान् को चढ़ा कर,
फेंकना था जो सड़ा फल, अर्पित कर दिया मंदिर जाकर..(वीरेंद्र)/1-891


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-890 गम नहीं जो तुमने मुझे

ग़म नहीं जो तुमने मुझे दो चार ग़म भी दे दिए,
आखिर इतनी खुशियां भी मेरे किस काम की थीं..(वीरेंद्र)/1-890


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 25 February 2017

2-500 बोलने की और भोंकने की

बोलने की और भोंकने की आज़ादी में बड़ा फर्क होता है,
जो न समझा इसको, एक दिन उसका बेड़ा गर्क होता है..(वीरेंद्र)/2-500


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 24 February 2017

2-504 सहिष्णुता छोड़, असहिष्णु

सहिष्णुता छोड़, असहिष्णु बन जाना चाहता हूँ,
देश के गद्दारों को सबक मै सिखाना चाहता हूँ,
मेरे देश की शान के खिलाफ बोलने वालों की, 
आग उगलती जुबां अब मै खींच लेना चाहता हूँ..(वीरेंद्र)/2-504

1-889 घोंप दिए भाले ओरों के

घोंप दिए भाले औरों के सीनों में जिन्होंने,
उन्हें एक तिनका भी लगने से दर्द होता है..(वीरेंद्र)/1-889

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-888 मत दे इतने दोस्त,

मत दे इतने दोस्त ऐ खुदा, मुझे फिरसे गरीब कर दे,
नहीं हो सकता गर कोई दोस्त तो मुझे रकीब कर दे..(वीरेंद्र)/1-888


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-503 गधे को गोद में

गधे को गोद में बिठा लो, तो गधे का क्या कसूर,
कौव्वे को मोती खिलाओ तो कौव्वे का क्या कसूर, 
मूर्खों को खुद ही शौक हो अगर गर्त में डूबने का, 
तो बोलिए, फिर इसमें डुबाने वाले का क्या कसूर .(वीरेंद्र)/2-503

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी".

2-494 कोई नहीं रहा असल में

कोई नहीं रहा असल में मेरे वोट के काबिल,
जिसको दिया वो भी हो गया धूर्तों में शामिल,
मुल्क सरक रहा है बस यूँ ही चींटी की तरह,
हरेक मशगूल लूटने में, जनता हुई है ग़ाफिल..(वीरेंद्र)/2-494


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-887 काश आंसुओं का

काश आंसुओं का भी कोई रंग हुआ करता,
लोग इनको पानी तो न समझ लिया करते..(वीरेंद्र)/1-887


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-886 मै नहीं डरता, वो ही

मैं नहीं डरता,वो ही मुझसे डर जाती है,
मौत मेरे अगल बग़ल से गुज़र जाती है..(वीरेंद्र)/1-886


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 21 February 2017

1-885 काश आंसुओं का भी

काश, आंसुओं का भी कोई रंग हुआ करता,
इनको लोग पानी तो न समझ लिया करते..(वीरेंद्र)/1-885

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 19 February 2017

1-884 कभी जिनके लिए दरियाए-

कभी जिनके लिए दरियाऐ-अश्क़ बहाए थे हमने,
वो आज क़तराए-मुहब्बत को हमें तरसाए बैठे हैं..(वीरेंद्र)/1-884


© रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 18 February 2017

1-883 गले से लगा लो पेड़ों को

गले से लगा लो पेड़ों को तुम, वे पाला नहीं बदलते,
वो कट जाते हैं, उखड जाते हैं, रवैय्या नहीं बदलते..(वीरेंद्र)/1-883

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-882 आधी दुनियां पर बेवफाई का

आधी दुनियां पर बेवफाई का इल्जाम है,
मेरा यार तो बेचारा बस यूँ ही बदनाम है..(वीरेंद्र)/1-882


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-881 मर जाते हैं जो,

मर जाते हैं जो, उनका जनाज़ा एक बार निकलता है,
अंदर से टूटके मरते हैं जो, उनका कई बार निकलता है..(वीरेंद्र)/1-881

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-591 शाखें टूट गईं मेरी,

शाखें टूट गईं मेरी, लोग समझते हैं अब ये शजर टूट गया है,
कोई पानी नहीं देता मुझको, सोचते हैं, ये अब सूख गया है,
मगर मेरी जड़ें अब भी बहुत गहरी और मज़बूत हैं, लोगों,
बस मेरी ज़मीन छिनने वाली है, मेरा भाग्य अब रूठ गया है..(वीरेंद्र)/0-591

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी

2-499 नेता का काम बोले या न बोले

नेता का काम बोले या न बोले, उसका उपनाम बोलता है,
प्रधानमंत्री तो भाइयों बनेगा वही, जिसका DNA बोलता है..(वीरेंद्र)/2-499

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-95 Edit...बचपन तो गया मेरा,

DRAFT
बचपन तो गया, मेरे खिलोने यहाँ अब भी रक्खे हैं,
मुस्कराहट गई, होठों पे उसके निशाँ अब भी रक्खे हैं,

सहर से पहले, अंधेरों में जो चराग जलाये थे मैंने,
अंधेरों की याद में बुझे चराग यहाँ अब भी रक्खे हैं, 

मुझे इतना ज़ब्त बख्शने वाले खुदा, ये भी बता दे,
ज़हर में बुझे कितने तीर, ज़माने ने यहाँ अब भी रक्खे हैं,

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1-880 तेरी खुशबू तेरा मुकम्मल

तेरी खुशबू तेरा मुकम्मल पता देती है मुझे,
तेरी आमो-दरफ्त की इत्तिला देती है मुझे..(वीरेंद्र)/1-880


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-879 चलो ये वादा है तुमसे,

चलो ये वादा है तुमसे, तुम्हे ज़रूर भुला देंगे हम, 
मगर ये नहीं जानते, आखरी सांस कब लेंगे हम..(वीरेंद्र)/1-879


रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

2-493 कोई कह रहा, बच्चे हैं

कोई कह रहा, बच्चे हैं, बेचारे बलात्कार कर देते हैं,
कश्मीरी कहते, बच्चे हैं, सेना पर पत्थर फ़ेंक देते हैं,
पर देखिये मेरा भारत कितना है सहिष्णु और महान,
चुनावों के वक्त इन्ही लोगों को नेता हम चुन लेते हैं..(वीरेंद्र)/2-493

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-498 न रोक सको फौजों पर

न रोक सको फौजों पर पत्थरबाज़ी, तो अपनी अक्ल पर तो न होने दो,
भूलकर सियासी दांवपेंच, दुश्मन-परस्तों को हावी मुल्क पर तो न होने दो..(वीरेंद्र)/2-498


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-497 सियासतदानों ने हर सिम्त

सियासतदानों ने हर सिम्त मसले बड़े उलझा रक्खे हैं,
ज़ुबाँ से निकले अलफ़ाज़ नफरतों के ज़हर में बुझा रक्खे हैं..(वीरेंद्र)/2-497


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"