Monday, 12 December 2016

1-842 खामोश तो हम हो

खामोश तो हम, हो भी जाएं आपकी तराह,
पर इससे मुहब्बतों का सिलसिला रुकता तो नहीं..(वीरेंद्र)/1-842

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

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