Monday, 12 December 2016

2-466 खुदगर्जी के किस मुकाम

खुदगर्ज़ी के किस मुकाम पर दुनिया जा रही है,
जज़्बाती इंसा की ज़िंदगी कितनी ज़ाया जा रही है..(वीरेंद्र)/2-466

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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