Sunday, 25 December 2016

1-854 मै नहीं जानता

मै नहीं जानता शाम कोे मुझे क्या हो जाता है,
दिनभर का खामोश ज़ख्म शाम को हरा हो जाता है..(वीरेंद्र)/1-854

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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