Wednesday, 28 December 2016

1-859 मुरझाए पत्ते बैठे

मुरझाए पत्ते बैठे रह गए आस में बहारों की,
किसी झोंकें ने आके शजर को ही गिरा डाला..(वीरेंद्र)/1-859

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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