Saturday, 31 December 2016

1-860 तुम आए भी

तुम आए भी और चले भी गए बहारों की तराह,
तुम्हे क्या इल्म चंद शजर अब भी मुरझाए हुए हैं..(वीरेंद्र)/1-860

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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