Sunday, 25 December 2016

0-580 मेरे दुश्मन ही मेरे

मेरे दुश्मन ही मेरे सबसे बड़े कद्रदान हैं,
मुझे पढ़ते हैं वो पूरा, भले देते नहीं दाद हैं।
चलो हम भी इतने में ही खुश हैं यारों,
दोस्त नहीं, दुश्मन तो हमपर मेहरबान हैं।(वीरेंद्र)/0-58

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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