Saturday, 31 December 2016

1-860 तुम आए भी

तुम आए भी और चले भी गए बहारों की तराह,
तुम्हे क्या इल्म चंद शजर अब भी मुरझाए हुए हैं..(वीरेंद्र)/1-860

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 30 December 2016

1-861 कभी तो अपने बारे में भी

कभी तो अपने बारे में भी सोच, ऐ ज़िन्दगी,
या हमेशा यूँही दबी-भिंची गुज़रती जाएगी..(वीरेंद्र)/1-861

रचना: © वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 28 December 2016

1-859 मुरझाए पत्ते बैठे

मुरझाए पत्ते बैठे रह गए आस में बहारों की,
किसी झोंकें ने आके शजर को ही गिरा डाला..(वीरेंद्र)/1-859

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-858 नेक दिल इंसान

नेक दिल इंसान कभी मरा नहीं करते,
बस चले जाते हैं सबके दिलों में बसने को..(वीरेंद्र)/1-858

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 25 December 2016

1-857 पहले तो लुटा दीं

पहले तो लुटा दीं तमाम मुहब्बतें मैंने,
अब थोड़ी सी के लिए मै खुद तरस रहा हूँ..(वीरेंद्र)/1-857

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-856 क्या कहने आपके

क्या कहने आपके जो आप बहुआयामी लिखते हैं,
हमतो सिर्फ अपने रंजोगम और नाकामी लिखते है..(वीरेंद्र)/1-856

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

1-855 तेरा नाम

तेरा नाम लेना छोड़ दिया अब हमने,
अजनबी जुबां पर तेरा नाम भी क्यों आए..(वीरेंद्र)/1-855

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-581 बदल जाना तो है

बदल जाना तो है कुदरत का सिलसिला,
मौसम ही क्या, हालात भी बदल जाते हैं।
थोड़ा बहुत तो दुनियां ही बदल जाती है,
पर कुछ लोग तो ज़्यादा ही बदल जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-581

रचना: वीरेंद्र सिन्हा © "अजनबी"

1-854 मै नहीं जानता

मै नहीं जानता शाम कोे मुझे क्या हो जाता है,
दिनभर का खामोश ज़ख्म शाम को हरा हो जाता है..(वीरेंद्र)/1-854

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-582 यह माना मै तेरे

यह माना मैं तेरे काबिल नहीं हूँ,
रंजो-ग़म में तेरे, शामिल नहीं हूँ,
पर तेरी कश्ती को डूबने न दूंगा,
जानता हूँ मैं तेरा साहिल नहीं हूँ..(वीरेंद्र)/0-582

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-853 मेरे महबूब

मेरे महबूब मुझे भी ये हुनर अपना सिखा दे,
रिश्ते कैसे तोड़े जाते हैं, मुझे इतना सिखा दे..(वीरेंद्र)/1-853

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-468 ज़मीं पर मिलें चार

ज़मीं पर मिलें चार, आसमाँ में बहत्तर,
चलो मर जाऐं, अट्ठारह गुना पाना है बेहतर..(वीरेंद्र)/2-468

रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-580 मेरे दुश्मन ही मेरे

मेरे दुश्मन ही मेरे सबसे बड़े कद्रदान हैं,
मुझे पढ़ते हैं वो पूरा, भले देते नहीं दाद हैं।
चलो हम भी इतने में ही खुश हैं यारों,
दोस्त नहीं, दुश्मन तो हमपर मेहरबान हैं।(वीरेंद्र)/0-58

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-852 मुझसे बात कर लोगे

मुझसे बात कर लोगे तो, छोटे नहीं हो जाओगे,
आप कोई शहर तो हैं नहीं, जो मेरे हो जाओगे..(वीरेंद्र)/1-852

रचना: वीरेंद्र  सिन्हा "अजनबी"

1-851 चल रही है ज़िन्दगी

चल रही है ज़िन्दगी, कि सांसें चल रही हैं,
चला चली में वक्त की घड़ियाँ चल रही हैं..(वीरेंद्र)/1-851

©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 17 December 2016

1-850 सूना रहा है कोई यूं

सुना रहा है कोई यूं अपनी उदासी का रोना,
यकीं हो गया मुझे, पत्थर भी उदास होते हैं..(वीरेंद्र)/1-850


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 16 December 2016

2-465 इंसा दुआ मांगते वक्त


इंसाँ दुआ मांगते वक्त मानता है, सामने है साक्षात् भगवान,
गुनाह करते हुए मगर सोचता है बड़ी दूर बेखबर है भगवान..(वीरेंद्र)/2-465

रचना: वीरेंद्र सिन्हा जनबी"

1-838 किस किस को भूल जाऊं


किस किस को भूल जाऊं मै, ऐ बेवफा,
मुझे तो हरेचेहरा तेरे जैसा लगने लगा है..(वीरेंद्र)/1-838


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 14 December 2016

2-472 सींग कटाने से


सींग कटाने से बैल कभी बछड़ा नहीं बन जाता,
निकर पहन लेने से बुङ्ढा बच्चा नहीं बन जाता,
रखता अगर कोई अपने आमाल साफ़ सुथरे तो,
वो इंसान बनता,  यूं लुच्चा-टुच्चा नहीं बन जाता..(वीरेंद्र)/2-472

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-839 मेरे ग़मों से भी खुशियों का

मेरे ग़मों से भी, खुशियों का मुग़ालता वो खा जाते हैं,
के अक्सर ख़ुशी में भी, मेरी आँख में आंसू आ जाते है..(वीरेंद्र)/1-839

रचना: © वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-840 आजकल नाकाबिले-बर्दाश्त

आजकल नाकाबिले-बर्दाश्त हो गए हैं  रिश्ते,
अब सिर्फ दीवारों पर टंगे अच्छे लगते हैं रिश्ते..(वीरेंद्र)/1-840

रचना:©वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

Monday, 12 December 2016

2-466 खुदगर्जी के किस मुकाम

खुदगर्ज़ी के किस मुकाम पर दुनिया जा रही है,
जज़्बाती इंसा की ज़िंदगी कितनी ज़ाया जा रही है..(वीरेंद्र)/2-466

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-841 मेरी जिंदगी में हर ख़ुशी

मेरी जिंदगी में हर ख़ुशी यूं आकर लौट गयी,
जैसे हर लहर किनारे को चूम कर लौट गयी..(वीरेंद्र)/1-841

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

2-464 किस कदर कमीने

किस कदर कमीने हो गए हैं लोग,
आँखें होके भी नाबीने हो गए हैं लोग..(वीरेंद्र)/२-464

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-842 खामोश तो हम हो

खामोश तो हम, हो भी जाएं आपकी तराह,
पर इससे मुहब्बतों का सिलसिला रुकता तो नहीं..(वीरेंद्र)/1-842

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

Friday, 9 December 2016

1-843 किनारा करने से

किनारा करने से क्या मिला आपको,
यादों में तो आज भी डूबे हुए हैं आप..(वीरेंद्र)/1-843

‌रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-844 शिकायत नहीं, क्यों

शिकायत नहीं, क्यों आपने हमसे किनारा कर लिया,
डूबते भी तो बहुत जा रहे थे आप, हमारी मुहब्बत में..(वीरेंद्र)/1-844

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

Thursday, 8 December 2016

0-578 कितनी ग़लतफ़हमी में

कितनी ग़लतफ़हमी में रहते थे हम,
इश्क में आपके पागल रहते थे हम,
सुकूँ हो गया आपके बेवफा होने से,
वर्ना तो ज़िंदगी से परेशां रहते थे हम..(वीरेंद्र)/०-578

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-845 बेवफा हो जाओ तो दूर

बेवफ़ा हो जाओ तो दूर चले जाना ही बेहतर,
सामने रहकर फिर आँख मिलाई नहीं जाती..(वीरेंद्र)/1-845

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-846 मालूम था मुझको

मालूम था मुझको मेरा साथ न दोगे तुम,
आखिर तुम भी किस किस का साथ देते..(वीरेंद्र)/1-846

 रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-473 काश, भावनाओं का भी कोई

काश, भावनाओं का भी कोई ऑन-ऑफ़ स्विच हुआ करता,
जब जितनी देर चाहता इंसान, ऑन-ऑफ़ कर लिया करता,
क्यों होता कोई अपने दिल के हाथों मायूस-ओ-मजबूर इतना,
भूलना होता किसी को तो, बस एक बटन दबा दिया करता..(वीरेंद्र)/2-473

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"