Wednesday, 30 November 2016

3-editमेरे कातिल का शौक

मेरे क़ातिल का शौक पूरा हो न सका,
क़त्ल किया मेरे बदन को जिसमे जान न थी,
मक़तूल ने ही मिटा दिए तमाम सबूत,
क़ातिल को सज़ा हो, उसकी इसमें शान न थी,
बेवफा की तोहमतें मैं यूं सुनता चला गया,
वो समझता रहा मेरे मुंह में जुबान न थी,
मेरे भी न पड़ते कदम ज़मीं पर उसकी तराह,
मेरे पास पंख न थे, बेवफाई की उड़ान न थी.
रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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