Wednesday, 30 November 2016

3-98 मेरे कातिल का शौक पूरा

मेरे क़ातिल का शौक पूरा हो न सका,
क़त्ल किया मेरा बदन जिसमे जान न थी,

मक़तूल ने ही मिटा दिए सबूत तमाम,
क़ातिल को हो सज़ा, इसमें उसकी शान न थी,


बेवफा की तोहमतें मैं यूं सुनता चला गया,
वो यूं समझता रहा, मेरे मुंह में जुबान न थी,

मेरे भी न पड़ते कदम ज़मीं पर उसकी तराह,
मेरे पास वो पंख न थे, बेवफाई की वो उड़ान न थी..(वीरेंद्र)/3-98

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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