Sunday, 20 November 2016

2-474 कहीं मेले हैं तो कहीं

कहीं मेले हैं तो कहीं तन्हाई है
यहाँ तो मगर उदासी छाई है,
कहीं चेहरे बुझे से लग रहे हैं,
कईयों पे रौनक लौट आई है,
माथे पर खिंची चोट की रेखा,
अब और ज्यदा उभर आई है..(वीरेंद्र)/2-474

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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