Sunday, 20 November 2016

0-577 हमारे दिल के टुकड़े

हमारे दिल के टुकड़े जितने बिखर रहे हैं,
बेवफाओं के चेहरे उतने ही निखर रहे हैं,
हम ही से थीं कभी जिनकी दिलबस्तगियां,
जाने क्यूं उनको आज हम ही अखर रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-577

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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