Wednesday, 30 November 2016

1-847 मुतवातिर क़त्ल करता गया

मुतवातिर क़त्ल करता गया, वो मेरे अरमानों का,
छुपाके तलवार उसकी, बेगुनाह हम उसे साबित करते गए..(वीरेंद्र)/1-847

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  "अजनबी"

1-848 मत पोंछो धुंध आईने से,

मत पोंछो धुंध आईने से, पड़ी रहने दो,
कुछ देर और सही, सच्चाई छुपी रहने दो..(वीरेंद्र)/1-848

रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-475 नोटबंदी के विरुद्ध

नोटबंदी के विरुद्ध दलों की गुटबंदी
यह राजनीति नहीं, नौटंकी है गन्दी,
घंटी बज रही है खतरे की देश में,
कालाधन-कुबेर हैं आर्थिक-आतंकी..(वीरेंद्र/2-475
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-467 हर घडी तुझसे दूर

हर घडी तुझसे दूर करती जा रही है अब मुझे, 
हर सांस लेती जा रही है क़ज़ा की तरफ मुझे..(वीरेंद्र)/2-467

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-579 नजदीकियां न बना पाएंगी

नज़दीकियां न बना पाएंगी रिश्ते,
ना ही दूरियां तोड़ पाएंगी रिश्ते,
दिलों से निकलती हैं जो आवाज़ें,
वही बना या बिगाड़ पाएंगी रिश्ते..(वीरेंद्र)/0-579 

रचना: ©  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-849 कौन कौन से उसूलों

कौन कौन से उसूलों का हवाला देकर मुकर जाते हैं लोग,
बहाना कोई भी बनाकर इंसानियत से भी गिर जाते हैं लोग..(वीरेंद्र)/1-849

रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-480 मै कहाँ कहाँ बचूंगा

मैं कहाँ कहाँ बचूंगा,
कभी मारेगा ज़मीर,
कभी मारेंगे जज़्बात,
कभी मारेंगे एहसासात,
कभी मारेगी मुहब्बत,
कभी फनाह करेगी नफरत,
हर रोज़ कोई न कोई मौत,
मैं भला कितनी बार मरूंगा..(वीरेंद्र)/2-480


रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-edit कभी जलाए कभी बुझाए

कभी जलाए कभी बुझाए चराग़ तेरी यादों के,
बस यूँ ही तमाम उम्र तन्हा बसर कर दी हमने..(वीरेंद्र)/1-

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-editमेरे कातिल का शौक

मेरे क़ातिल का शौक पूरा हो न सका,
क़त्ल किया मेरे बदन को जिसमे जान न थी,
मक़तूल ने ही मिटा दिए तमाम सबूत,
क़ातिल को सज़ा हो, उसकी इसमें शान न थी,
बेवफा की तोहमतें मैं यूं सुनता चला गया,
वो समझता रहा मेरे मुंह में जुबान न थी,
मेरे भी न पड़ते कदम ज़मीं पर उसकी तराह,
मेरे पास पंख न थे, बेवफाई की उड़ान न थी.
रचना:वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-editमुझे गिले-शिकवे क्यों

मुझे क्यों हों गिले-शिकवे इस ज़माने से भला,
मुझसे बेवफा होने वाले भी कहाँ मेरे अपने थे..(वीरेंद्र)/1-

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-edit आसानी से रंग बदल

आसानी से रंग बदल लेते हैं, कितने रंगीले होते हैं लोग,
काश उतने ही अच्छे होते, जितने तस्वीरों में लगते हैं लोग..(वीरेंद्र)/1-

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-837 फनाह कर दे,

फनाह कर दे,मेरा वजूद मिटा दे,मगर 
मैं कबतक उफ़्फ़ न करुँ ये तो बता दे..(वीरेंद्र)/1-837

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 24 November 2016

1-822 काश एक दिन ऐसा भी

काश एक दिन ऐसा भी गुज़र जाए,
तुझको न देखूं और ग़ज़ल बन जाए..(वीरेंद्र)/1-822

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 20 November 2016

2-463 देश बदल रहा है और

देश बदल रहा है और दिखाई भी दे रहा है,
विरोधियों को मगर ये कहाँ दिखाई दे रहा है..(वीरेंद्र)/2-463

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-835 अपने भी नहीं अपने

अपने भी नहीं अपने, गैर क्या होंगे अपने,
हक़ीक़तें भी नहीं अपनी, सपने तो हैं सपने..(वीरेंद्र)/1-835

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-577 हमारे दिल के टुकड़े

हमारे दिल के टुकड़े जितने बिखर रहे हैं,
बेवफाओं के चेहरे उतने ही निखर रहे हैं,
हम ही से थीं कभी जिनकी दिलबस्तगियां,
जाने क्यूं उनको आज हम ही अखर रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-577

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-834 जबसे उसने मेरा मासूम दिल

जबसे उसने मेरा मासूम दिल दुखाया है,
चेहरे पर उसके ग़ज़ब निखार आया है..(वीरेंद्र)/1-834

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-474 कहीं मेले हैं तो कहीं

कहीं मेले हैं तो कहीं तन्हाई है
यहाँ तो मगर उदासी छाई है,
कहीं चेहरे बुझे से लग रहे हैं,
कईयों पे रौनक लौट आई है,
माथे पर खिंची चोट की रेखा,
अब और ज्यदा उभर आई है..(वीरेंद्र)/2-474

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-833 दुनियां गोल है यार,

दुनियां गोल है यार, इतना भी भाव मत खा,
कौन जाने घूमफिर के तू मुझे कहाँ मिल जा..(वीरेंद्र)/1-833

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-832 न समझा कर खुद को

न समझा कर खुद को खुदा
दुनियां में नाखुदा भी होते हैं..(वीरेंद्र)/1-832

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-471 देशद्रोहियों को सर्जिकल

देशद्रोहियों को सर्जिकल स्ट्राइक भी मसनवी लग रहीं हैं,
मोदी को मिली जो दुआएं, गद्दारों को बद्दुआएं लग रही हैं,
हड़कंप मचा है गद्दारों में ,कहाँ से देंगे पेमेंट दहशतगर्दों को
पुराने नोट बंद और नए के वास्ते लाइनें लंबी लग रहीं हैं..(वीरेंद्र)/2-471

रचना; वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

1-831 हर रोज़ बिला नागा

हर रोज़ बिला नागा चली आती हैं तेरी यादें,
तन्हाई में मेरी ख़लल डाल जाती है तेरी यादें..(वीरेंद्र)/1-831

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-470 मुल्क का कानून बड़ा नर्म

मुल्क का कानून बड़ा नर्म है,
देशभक्त है ठंडा, गद्दार गर्म है,
दुश्मन परस्तों को बोलने में,
न कोई गुरेज़ है न कोई शर्म है..(वीरेंद्र)/2-470

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 13 November 2016

1-830 ख़ामोशी को अपनी मेरी

ख़ामोशी को अपनी, मेरी सज़ा न समझ,
नफरतों को अपनी, मेरी क़ज़ा न समझ..(वीरेंद्र)/1-830

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-836 तोते की जुबां बोलोगे

तोते की ज़ुबाँ बोलोगे तो पिंजरे में कैद रहोगे
कोयल की मीठी बोली बोलो, आज़ाद रहोगे..(वीरेंद्र)/1-836

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-829 दिल की दिल में लेकर

.
दिल की दिल में लेकर ही चले जाएंगे हम,
वक्त की कमी है, आरज़ू पूरी कर न पाएंगे हम..(वीरेंद्र)/1-829

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-828 इसी तरह रंज-ओ-गम

इसी तराह रंज-ओ-गम देते रहा करो तुम मुझे,
वजूद का मेरे यकीन दिला दिया करो तुम मुझे..(वीरेंद्र)/1-828

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 10 November 2016

0-576 जहाँ चाह है, वहां

जहाँ चाह है, वहां राह है,
बहाने बनाना बेवजाह है,
भूलना है तो भूल जाओ,
यहाँ भी किसे परवाह है..(वीरेंद्र)/0-576

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-827 निगोड़ी तकदीर भी कैसी है

निगोड़ी तक़दीर कैसी है, कहीं चैन से सांस नहीं लेने देती,
कहीं है दूषित हवा, तो कहीं ज़िन्दगी सांस नहीं लेने देती..(वीरेंद्र)/1-827

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-459 देशद्रोही तेरी जुबां

देशद्रोही तेरी ज़ुबान काफी है पर्यावरण ख़राब करने के लिए,
तेरा नाम ही पर्याप्त है देश का मौहाल बर्बाद करने के लिए,
तू इस कदर आतंक फैला देता है राजनीती के गलियारों में,
देशभक्तों को बरसों बरसों लग जाते हैं इसे साफ़ करने के लिए..(वीरेंद्र)/2-459


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

Friday, 4 November 2016

1-826 मत पूछो सवाल

मत पूछ सवाल इस झूंटे ज़माने से,
मिल जाएंगे जवाब सारे आईने से..(वीरेंद्र)/1-826

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-825 जुबां सिल लेते हैं,

ज़ुबाँ सिल लेते हैं, दिल दबा लेते हैं,किनारा करने वाले,
जाने कब हाथ थाम लेते हैं रकीब का ये भूल जाने वाले..(वीरेंद्र)/1-825

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-824 न ज़मीं की कमी है

न ज़मीं की कमी है ना आसमाँ की कमी है,
ज़िंदगी में आज से बस एक माँ की कमी है..(वीरेंद्र)/1-824

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-823 बिना मज्मून का कागज़

बिना मज़मूं का कागज़ ही रख कर भेज दिया उसने,
खुदा का शुक्र लिफ़ाफ़े पर मेरा नाम लिख दिया उसने..(वीरेंद्र)/1-823

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-821 दुनियां जहांन ने पढ़

दुनियां जहाँन ने पढ़ लिए शेर, जो लिखे थे मैंने,
बस उसी ने ना पढ़े जिसके लिए वो लिखे थे मैंने..(वीरेंद्र)/1-821

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-820 खामोश ही रह "अजनबी"

खामोश ही रह 'अजनबी', इज़हार न कर ख्यालात का
जाने कौन क्या मतलब निकाल ले तेरी किसी बात का..(वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-819 उससे और कुछ पूछना

उससे और कुछ पूछना भी हिमाकत होगी,
जिसकी बदली हुई नज़र ही मुकम्मल जवाब है..(वीरेंद्र)/1-819

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-462 कुछ दिन से ऐसा कुछ

कुछ दिन से ऐसा कुछ हुआ नहीं जिसका हम इलज़ाम लगा दें,
आओ विरोधियों फिरभी हम किसी न किसी का पुतला जला दें..(वीरेंद्र)/2-462

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-818 देख लिया कर मेरी तरफ

देख लिया कर मेरी तरफ इसी अदा से,
फिर बता न बता, तुझे मुहब्बत है मुझसे..(वीरेंद्र)/1-818

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"