Tuesday, 25 October 2016

2-458 अब ज़माना बदल गया

अब ज़माना बदल गया है,
रुख हवा का बदल गया है,
अब रूठने का फायदा नहीं,
चढ़ता सूरज अब ढल गया है..(वीरेंद्र)/2-458


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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