Sunday, 23 October 2016

2-454आज़ाद होकर भी बार-बार

आज़ाद होकर भी, बार-बार मांगते हो कौन सी आज़ादी,
कहीं जाकर पहले देख लो गुलामी, फिर माँगना आज़ादी..(वीरेंद्र)/2-454


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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