Wednesday, 5 October 2016

2-444 मादरेवतन में मेरे कैसे

मादरेवतन में मेरे कैसे कैसे सियसतदां बैठे हैं,
जज़्बा-ऐ-वतनपरस्ती को बेचकर यहाँ बैठे हैं,
रातदिन तोहमते-नाबर्दाश्तगी लगाते थे हम पे,
वो मुंतज़िर-ऐे-हुकूमत अब क्यों बेज़ुबाँ बैठे हैं...(वीरेंद्र)/2-444


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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