Saturday, 22 October 2016

1-814 काश नींद न होती,

काश नींद न होती, ख्वाब न हुआ करते,
तनहा ज़िन्दगी के दिन सुकूँ से कटा करते..(वीरेंद्र)/1-814


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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