Sunday, 9 October 2016

1-812 बहार अब रवानगी पर है

बहार अब रवानगी पर है,
तुम आजाओ तो शायद ठहर जाये..(वीरेंद्र)/1-812


रचना: "वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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