Wednesday, 12 October 2016

1-809 मुहब्बतों के चराग

मुहब्बतों के चराग अभी अभी बुझे हैं,
रौशनी तो गयी इनकी, धुंए मगर अभी बचे है..(वीरेंद्र)/1-809

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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