Sunday, 30 October 2016

0-575 ताउम्र हाथों में बनाई

ताउम्र हाथों में बनाई, तेरी लकीर खींच-खींच कर,
कब से जी रहा हूँ बस तेरी तस्वीर देख-देख कर,
तेरी तलाश को इत्तेताम तक पहुंचा नहीं पाया मैं,
तुझे ही पुकारता हूँ वीरानों में भी चीख-चीख कर..(वीरेंद्र)/0-575


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

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