Tuesday, 25 October 2016

0-574 छुप गया चांद भी

छुप गया चाँद भी, उधर जब भी देखा है,
टूट गया हर ख्वाब, हमने जब भी देखा है,
खुद को और भी ज़्यादा दूर पाया हमने,
जानिबे मंज़िल बढ़ाके कदम जब भी देखा है..(वीरेंद्र)/0-574

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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