Sunday, 30 October 2016

1-817 अब और बेरुखी दिखने की

अब और बेरुखी दिखाने की कोशिश न कर मुझसे,
तेरी हर कोशिश से मेरी मोहब्बत को हवा मिल रही है..(वीरेंद्र)/1-817


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-816 'अजनबी' बना रहने दे

'अजनबी' बना रहने दे मुझे, मुझसे आशना न हो,
तेरा बनकर मैं मतलबी हो जाऊं कहीं ऐसा न हो..(वीरेंद्र)/1-816


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-815 दिल के जज़्बात-ओ-एहसासात

दिल के जज़्बात-ओ-एहसासात में डूब जाने की ज़रुरत होती है,
शायरी को समझने की नहीं, महसूस करने की ज़रुरत होती है..(वीरेंद्र)/1-815


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-461 सारे नेतागण चौकस और


सारे नेतागण चौकस और सयाने हो गए,
मगर मूर्ख मतदाता बस सठिया गया है।

वोट बैंक-वालों के मसाइल तो हल होगये,
असंगठित वोटर को दफना दिया गया है।


सबने छीन लिया खम्बा पटरी उखाड़ के, 
शेष जनरल वर्ग को लटका दिया गया है..(वीरेंद्र)/2-461


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-460 मनमोहक रूप देखने

मनमोहक रूप देखने की लालसा में,
निहारक बहुत उत्सुक हो जाता है।
किन्तु सत्यवादी निर्दयी दर्पण है कि,
बड़ा निर्लज्ज मुंहफट हो जाता है।
बोल देता है सही उम्र बिन लाग लपेट,
कृत्रिम बनाव श्रृंगार प्रकट हो जाता है।.(वीरेंद्र)/2-460


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-575 ताउम्र हाथों में बनाई

ताउम्र हाथों में बनाई, तेरी लकीर खींच-खींच कर,
कब से जी रहा हूँ बस तेरी तस्वीर देख-देख कर,
तेरी तलाश को इत्तेताम तक पहुंचा नहीं पाया मैं,
तुझे ही पुकारता हूँ वीरानों में भी चीख-चीख कर..(वीरेंद्र)/0-575


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

Tuesday, 25 October 2016

2-458 अब ज़माना बदल गया

अब ज़माना बदल गया है,
रुख हवा का बदल गया है,
अब रूठने का फायदा नहीं,
चढ़ता सूरज अब ढल गया है..(वीरेंद्र)/2-458


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-574 छुप गया चांद भी

छुप गया चाँद भी, उधर जब भी देखा है,
टूट गया हर ख्वाब, हमने जब भी देखा है,
खुद को और भी ज़्यादा दूर पाया हमने,
जानिबे मंज़िल बढ़ाके कदम जब भी देखा है..(वीरेंद्र)/0-574

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-573 बुझे चिराग का यह धुआं

बुझे चराग़ का यह धुआं बता रहा है,
अभी अभी ख़त्म हुई है दास्ताँ कोई,
तन्हाई में लिपटा सन्नाटा जता रहा है,
अभी अभी यहाँ से गुज़रा है तूफ़ाँ कोई..(वीरेंद्र)/0-573


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

Monday, 24 October 2016

2-457 बहुत सी बातें ज़हन

बहुत सी बातें ज़हन में आतीं हैं तब ही,
चिकनी खाल पे झुर्रियां जब पड़ जाती हैं


कागज़ के फूलों में खुशबू आती है तब ही,
इत्र की छींटें उन पर जब बिखर जातीं हैं।..(वीरेंद्र)/2-457


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-456 देश का सबसे बड़ा

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य,
आज इसमें गद्दार बहुत है,
बाहरी शत्रु से जीता ये हमेशा,
पर अपनों से खाई मार बहुत है..(वीरेंद्र)/2-456


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

2-455 रिश्ता एक नहीं होता

रिश्ता एक नहीं होता, अनेक होते हैं,
निभाने होते हैं सभी, सब नेक होते हैं
एक दूसरे से निकलते हैं सभी रिश्ते,
जब दो परिवार बंधन में एक होते हैं..(वीरेंद्र)/2-455


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 23 October 2016

0-572 बहुत समझाया, बहुत टोका

बहुत समझाया, बहुत टोका ज़माने ने
मुहब्बत करने से बहुत रोका ज़माने ने,
फ़ना होने का शौक था, फ़ना होकर रहे,
ना उसने रोका हमें, ना रोका ज़माने ने..(वीरेंद्र)/0-572


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-454आज़ाद होकर भी बार-बार

आज़ाद होकर भी, बार-बार मांगते हो कौन सी आज़ादी,
कहीं जाकर पहले देख लो गुलामी, फिर माँगना आज़ादी..(वीरेंद्र)/2-454


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 22 October 2016

1-814 काश नींद न होती,

काश नींद न होती, ख्वाब न हुआ करते,
तनहा ज़िन्दगी के दिन सुकूँ से कटा करते..(वीरेंद्र)/1-814


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 19 October 2016

2-453 वतनपरस्ती की बात

वतनपरस्ती की बात करने में भी अब लोग कतराने लगे हैं,
गद्दारों को देखो, कितनी हिम्मत से वो गद्दारी करने लगे हैं..(वीरेंद्र)/2-453


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-445 गद्दार की जुबां में

ग़द्दार की ज़ुबान में इतना जो ज़ोर है,
कानून का डंडा क्या इतना कमज़ोर है,
मुरव्वत किस बात की, ऐसे के साथ में,
जो शख्स बे-हया बे-गैरत हरामखोर है..(वीरेंद्र)/2-445


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 17 October 2016

1-813 "जब गमे-इश्क सताता है"

'जब ग़मे-इश्क़ सताता है तो' आईने को ढक देता हूँ,
निकाल के हसीं दिनों की तस्वीर सामने रख लेता हूँ..(वीरेंद्र)/1-813


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

1-811 हर बार चला जाता हूँ

हर बार चला जाता हूँ मैं, फिर न आने के लिए,
क्यों बुला लेते हो तुम मुझे, फिर चले जाने के लिए,(वीरेंद्र)/1-811


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-452 रावण को मारा था

रावण को मारा था श्रीराम ने, हम तो उसे बस दहन कर रहे हैं,
वरना घूम रहे कितने रावण, हम हैं कि बेबस सहन कर रहे हैं। (वीरेंद्र)/2-452


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-810 कौन कहता है वक्त सिर्फ

कौन कहता है वक्त, सिर्फ सितम ही करता है,
हमने तो अक्सर देखा है, वो करम भी करता है।.(वीरेंद्र)/1-810


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

2-451 ज़िन्दगी में तरक्की

ज़िन्दगी में तरक्की तजुर्बों से की जाती है,
इनकी तालीम हमें ठोकरों से दी जाती है।..(वीरेंद्र)/२-451


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-446 जब तुम्हारा कुछ फायदा

जब तुम्हारा कुछ फायदा हो,
तो चलेगा भारतीय संविधान।
और अगर फायदा न हुआ तो,
चलेगा हदीस और क़ुरआन।
बाकी सब अनपढ़ और गंवार,
वाह मौलाना एक तुम्ही विद्वान्।..(वीरेंद्र)/२-446


©रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"...

Wednesday, 12 October 2016

1-809 मुहब्बतों के चराग

मुहब्बतों के चराग अभी अभी बुझे हैं,
रौशनी तो गयी इनकी, धुंए मगर अभी बचे है..(वीरेंद्र)/1-809

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-437 जो लोग सीना ठोक कर

जो लोग सीना ठोक कर सर्जिकल स्ट्राइक्स को झूंटा बता रहे हैं 
उन्हीं के परिवार अपनी सुरक्षा के लिए मोदी से गुहार लगा रहे हैं।
देश की सुरक्षा में समर्पित वीर सैनिकों का सम्मान तो रहा दूर,
दुश्मन के समक्ष उनके शौर्य व हौंसलों पर प्रश्न-चिन्ह लगा रहे हैं।.(वीरेंद्र)/2-437


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 10 October 2016

2-436 झूंटे वायदे करने वाले

झूंटे वायदे करने वाले लोग,
सत्तासीन रहे सब सरकारों में,
बाद में हरिश्चंद्र बन जाते हैं, 
जो लिप्त रहे तमाम घोटालों में..(वीरेंद्र)/2-436


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 9 October 2016

2-435 मारते रहेंगे तेरे

मारते रहेंगे तेरे भेजे हर फिदायीन को, 
यूँही वीराँ कर देंगे हम तेरी ज़मीन को,
हैवानियत खूंरेज़ी हमारा मक़सद नहीं,
मगर कैसे रोकूँ इन्साफ की संगीन को..(वीरेंद्र)/2-435


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ."अजनबी"

1-808 आँख बंद कर लेने से

आँख बंद कर लेने से हक़ीक़त छुप नहीं जाती,
ये और बात है आँख खुलने तक नज़र नहीं आती..(वीरेंद्र)/1-808

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-812 बहार अब रवानगी पर है

बहार अब रवानगी पर है,
तुम आजाओ तो शायद ठहर जाये..(वीरेंद्र)/1-812


रचना: "वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 5 October 2016

2-444 मादरेवतन में मेरे कैसे

मादरेवतन में मेरे कैसे कैसे सियसतदां बैठे हैं,
जज़्बा-ऐ-वतनपरस्ती को बेचकर यहाँ बैठे हैं,
रातदिन तोहमते-नाबर्दाश्तगी लगाते थे हम पे,
वो मुंतज़िर-ऐे-हुकूमत अब क्यों बेज़ुबाँ बैठे हैं...(वीरेंद्र)/2-444


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-571 इतने भी दूर न निकल

इतने भी दूर न निकल जाएं,
फासले इतने भी न बन जाएं,
कि फिर पास आ न सकें हम,
हालात ऐसे अगर बन जाएं..(वीरेंद्र)/0571


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"