Friday, 30 September 2016

2-443 बढती ही जा रही है

बढ़ती ही जा रही है 'नाबर्दाश्तगी' यहाँ वहां, 
अमन के फ़रिश्ते अब जाएँ भी तो जाएँ कहाँ,
मेरा मुल्क ही बचा था  एक महफूज़ जगाह,
शत्रु तुले हैं मिटाने को इसका भी नामोनिशाँ..(वीरेंद्र)/2-443


रचना:  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

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